Home कविता “मंज़िलें बहुत हैं , अथक प्रयास की जरूरत है “

“मंज़िलें बहुत हैं , अथक प्रयास की जरूरत है “

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[1]

‘हर  राह  तेरी  राह  देखती  है  बंधु ‘,’ तू  जरा  चल  कर  दिखा ‘ ,
‘तू  एक मंज़िल को  नहीं ‘,’ हर मंज़िल  को पा  जाएगा  जल्दी’ |

[2]

जिम्मेदारियाँ – मेरी अलार्म सरीखी हैं ‘,’ जरूरत पर हिला देती हैं ‘,
‘ज़रा ढीला पड़ा’ ,’ वो मेरी चाबी कसने में कोई कसर नहीं छोड़ती ‘ |

[3]

“मेरी सोच “:- 
” जब   भीतर   ही   सुख   का   श्रोत   है  ,  फिर   अपने   को   छोड़   इधर – उधर   का   चिंतन   किसलिए ” ?

[4]

‘ आओ  कुछ  ख्वाब  बुनें , फिर  तैयारी  मेँ  जुटें ‘,
कल के भरोसे तो बैठे रहेंगे ,कल आता नहीं कभी ‘ |

[5]

‘समझदारी से निभाए रिस्ते मेँ ,कोई रंग-रूप नहीं होता ,’
‘सिर्फ  प्यार  का  धागा  है  जो  , टूटने  मत  देना  कभी ‘|

[6]

‘काबलियत बड़ी मुखर है,बिना कहे अपनी खुशबू फैला ही देती है’ ,
‘रंजिशों  के  जाल  मेँ  तो  राजे-महाराजों  ने  भी  जमीन  सूंघी  है ‘|

 

 

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