Home कोट्स Motivational Quotes जो नियति है वो निश्चित है , फिर चिंता किसलिए ! प्रेरणादायक प्रसंग !हमारा अतीत !

जो नियति है वो निश्चित है , फिर चिंता किसलिए ! प्रेरणादायक प्रसंग !हमारा अतीत !

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**हमारा अतीत***

टालस्टाय   ने  एक   छोटी  सी  कहानी  लिखी  है।  मृत्यु  के  देवता  ने  अपने  एक दूत  को   भेजा  पृथ्वी  पर ।  एक  स्त्री  मर  गयी  थी , उसकी  आत्मा  को  लाना  था ।

देवदूत  आया , लेकिन  चिंता  में  पड़  गया।  क्योंकि  तीन  छोटी-छोटी  लड़कियां जुड़वां–एक  अभी  भी  उस  मृत  स्त्री  से  लगी  है ।  एक  चीख  रही  है , पुकार  रही   है।  एक  रोते-रोते  सो  गयी  है , उसके  आंसू  उसकी  आंखों  के  पास  सूख  गए  हैं–तीन  छोटी  जुड़वां  बच्चियां  और  स्त्री  मर  गयी  है ,  और  कोई  देखने  वाला  नहीं है । पति  पहले  मर  चुका  है।  परिवार  में  और  कोई   भी   नहीं   है ।  इन   तीन  छोटी बच्चियों  का  क्या  होगा ?

उस  देवदूत  को  यह  खयाल  आ  गया , तो  वह  खाली  हाथ   वापस  लौट   गया । उसने  जा कर अपने  प्रधान  को  कहा  कि  मैं  न ला सका , मुझे  क्षमा  करें, लेकिन आपको  स्थिति  का  पता  ही  नहीं  है । तीन जुड़वां  बच्चियां  हैं– छोटी-छोटी , दूध पीती । एक अभी  भी  मृत  से  लगी  है,  एक रोते-रोते  सो  गयी  है , दूसरी अभी चीख-पुकार  रही   है ।  हृदय  मेरा  ला  न  सका।  क्या  यह  नहीं  हो  सकता  कि  इस स्त्री  को  कुछ  दिन  और  जीवन  के  दे  दिए  जाएं ?  कम  से  कम  लड़कियां  थोड़ी बड़ी  हो  जाएं ।  और  कोई  देखने  वाला  नहीं  है ।

मृत्यु  के  देवता  ने  कहा ,  तो  तू  फिर  समझदार  हो  गया ;  उससे  ज्यादा,….. जिसकी  मर्जी  से  मौत  होती  है , …….जिसकी  मर्जी  से  जीवन  होता  है !

तो  तूने  पहला  पाप  कर  दिया ,  और  इसकी  तुझे  सजा  मिलेगी । और  सजा  यह है   कि   तुझे  पृथ्वी  पर  चले  जाना  पड़ेगा ।  और  जब  तक  तू  तीन  बार  न   हंस लेगा  अपनी  मूर्खता   पर ,  तब  तक  वापस  न  आ  सकेगा ।

इसे  थोड़ा  समझना ।

तीन   बार  न  हंस  लेगा  अपनी  मूर्खता  पर –क्योंकि  दूसरे  की  मूर्खता  पर  तो अहंकार   हंसता   है ।  जब   तुम   अपनी   मूर्खता   पर   हंसते   हो   तब   अहंकार टूटता   है  ।

देवदूत   को   लगा   नहीं  । वह   राजी  हो  गया  दंड   भोगने   को ,  लेकिन  फिर  भी उसे  लगा  कि   सही   तो   मैं   ही   हूं ।  और  हंसने  का  मौका  कैसे  आएगा ?

उसे  विदेश  की  जमीन  पर  फेंक   दिया  गया ।

एक  जूता  कारीगर ,  सर्दियों  के  दिन  करीब  आ  रहे  थे  और  बच्चों  के  लिए  कोट और  कंबल  खरीदने  शहर  गया  था ,  कुछ  रुपए  इकट्ठे  कर  के ।  जब  वह  शहर जा  रहा  था  तो  उसने  राह  के  किनारे  एक  नंगे  आदमी  को  पड़े  हुए , ठिठुरते  हुए देखा। 

यह  नंगा  आदमी  वही  देवदूत  है  जो  पृथ्वी  पर  फेंक  दिया  गया  था ।

उस  कारीगर  को  दया  आ  गयी ।  और  बजाय  अपने  बच्चों  के  लिए  कपड़े खरीदने  के ,  उसने  इस  आदमी  के  लिए  कंबल  और  कपड़े  खरीद  लिए ।

इस  आदमी  को  कुछ  खाने- पीने  को  भी  न  था ,  घर  भी  न  था,  छप्पर  भी   न था  जहां  रुक  सके ।  तो  कारीगर  ने  कहा  कि  अब  तुम  मेरे  साथ  ही  आ  जाओ।  लेकिन  अगर  मेरी  पत्नी  नाराज  हो –जो  कि  वह  निश्चित  होगी , क्योंकि  बच्चों  के लिए  कपड़े  खरीदने  लाया  था ,  वह  पैसे  तो  खर्च  हो  गए –वह  अगर  नाराज  हो , चिल्लाए , तो  तुम  परेशान  मत  होना ।  थोड़े  दिन  में   सब  ठीक  हो  जाएगा ।

उस  देवदूत  को  ले  कर  कारीगर  घर  लौटा । न  तो  कारीगर  को  पता  है  कि देवदूत  घर  में  आ  रहा  है ,  न  पत्नी  को  पता  है ।  जैसे  ही  देवदूत  को  ले  कर कारीगर  घर  में  पहुंचा ,  पत्नी  एकदम  पागल  हो  गयी।  बहुत  नाराज  हुई , बहुत चीखी- चिल्लायी । और  देवदूत  पहली  दफा  हंसा । कारीगर  ने  उससे  कहा ,  हंसते हो ,  बा त  क्या  है ?  उसने  कहा ,  मैं  जब  तीन  बार  हंस  लूंगा  तब  बता  दूंगा ।

देवदूत  हंसा  पहली  बार , क्योंकि  उसने  देखा  कि  इस  पत्नी  को  पता  ही  नहीं  है कि  कारीगर  देवदूत  को  घर  में  ले  आया  है ,  जिसके  आते  ही  घर  में   हजारों खुशियां  आ  जाएंगी ।  लेकिन  आदमी  देख  ही  कितनी  दूर  तक  सकता  है! पत्नी  तो  इतना  ही  देख  पा  रही  है  कि  एक  कंबल  और  बच्चों  के  पकड़े  नहीं  बचे । जो खो  गया  है  वह  देख  पा  रही  है ,  जो  मिला  है  उसका  उसे  अंदाज  ही  नहीं  है –मुफ्त!  घर  में  देवदूत  आ  गया  है । जिसके  आते  ही  हजारों  खुशियों  कश्रो ,नंं क्या घट  रहा  है !

जल्दी  ही,  क्योंकि  वह  देवदूत  था ,  सात  दिन  में  ही  उसने  जूता  कारीगर  का सब  काम  सीख  लिया ।  और  उसके  जूते  इतने  प्रसिद्ध  हो  गए  कि  कारीगर महीनों  के  भीतर  धनी  होने   लगा ।  आधा  साल  होते-होते  तो  उसकी  ख्याति   सारे  लोक  में  पहुंच  गयी  कि  उस   जैसा  जूते  बनाने  वाला  कोई  भी  नहीं , क्योंकि  वह  जूते  देवदूत  बनाता  था । सम्राटों  के  जूते  वहां  बनने  लगे । धन अपरंपार  बरसने  लगा।  एक दिन  सम्राट  का  आदमी आया। और  उसने  कहा      कि  यह  चमड़ा  बहुत  कीमती  है ,  आसानी  से  मिलता  नहीं ,  कोई  भूल-चूक      नहीं   करना  ।  जूते  ठीक  इस  तरह  के  बनने  हैं ।  और  ध्यान  रखना  जूते  बनाने हैं , स्लपर  नहीं ।  क्योंकि  इस  देश  में  जब  कोई  आदमी  मर  जाता  है  तब  उसको स्लीपर  पहना  कर   मरघट  तक  ले  जाते  हैं ।  कारीगर  ने  भी  देवदूत  को  कहा  कि  स्लीपर  मत  बना  देना ।  जूते  बनाने  हैं ,  स्पष्ट आज्ञा  है , और  चमड़ा  इतना ही  है ।  अगर गड़बड़  हो  गयी  तो  हम  मुसीबत  में  फंसेंगे ।

लेकिन  फिर  भी  देवदूत  ने  स्लीपर  ही  बनाए ।

जब  कारीगर  ने  देखे  कि  स्लीपर  बने  हैं  तो  वह  क्रोध  से   आगबबूला  हो  गया । वह  लकड़ी  उठा  कर  उसको  मारने  को  तैयार  हो  गया  कि  तू  हमारी  फांसी  लगवा  देगा !  और  तुझे  बार-बार  कहा  था  कि  स्लीपर  बनाने  ही  नहीं  हैं , फिर स्लीपर  किसलिए ?  देवदूत  फिर  खिलखिला  कर  हंसा ।

तभी  आदमी  सम्राट  के  घर  से  भागा  हुआ  आया ।  उसने  कहा , जूते  मत  बनाना , स्लीपर  बनाना ।  क्योंकि  सम्राट  की  मृत्यु  हो  गयी  है ।

भविष्य  अज्ञात  है ।  सिवाय  उसके  और  किसी  को  ज्ञात  नहीं ।  और  आदमी  तो अतीत  के  आधार  पर  निर्णय  लेता  है ।  सम्राट  जिंदा  था  तो  जूते  चाहिए  थे , मर गया  तो  स्लीपर  पर  चाहिए ।

तब  वह  कारीगर  उसके  पैर  पकड़  कर  माफी  मांगने  लगा  कि  मुझे  माफ  कर  दे, मैंने  तुझे  मारा ।  पर  उसने  कहा ,  कोई  हर्ज  नहीं ।  मैं  अपना  दंड  भोग  रहा  हूं । लेकिन  वह  हंसा  आज  दुबारा ।  कारीगर  ने  फिर  पूछा  कि  हंसी  का  कारण ? उसने  कहा  कि  जब  मैं  तीन  बार  हंस  लूं…।

दुबारा  हंसा  इसलिए  कि  भविष्य  हमें  ज्ञात  नहीं  है ।  इसलिए  हम  आकांक्षाएं करते  हैं  जो  कि  व्यर्थ  हैं।  हम  अभीप्साएं  करते  हैं  जो  कभी  पूरी  न  होंगी ।  हम मांगते  हैं  जो  कभी  नहीं  घटेगा ।  क्योंकि  कुछ  और  ही  घटना  तय  है ।  हमसे बिना  पूछे  हमारी  नियति  घूम  रही  है ।  और  हम  व्यर्थ  ही  बीच  में  शोरगुल मचाते  हैं ।  चाहिए  स्लीपर  और  हम  जूते  बनवाते  हैं ।  मरने  का  वक्त  करीब  आ रहा  है   और   जिंदगी  का  हम  आयोजन  करते  हैं ।  तो  देवदूत  को  लगा  कि  वे बच्चियां!  मुझे  क्या  पता ,  भविष्य  उनका  क्या  होने  वाला  है ?  मैं  नाहक  बीच  में  आया। 

और  तीसरी  घटना  घटी  कि  एक  दिन  तीन  लड़कियां  आयीं  जवान । उन  तीनों की  शादी  हो  रही  थी ।  और  उन  तीनों  ने  जूतों  के  आर्डर  दिए  कि  उनके  लिए जूते  बनाए  जाएं ।  एक  बूढ़ी  महिला  उनके  साथ  आयी  थी  जो  बड़ी  धनी  थी । देवदूत  पहचान  गया ,  ये  वे  ही  तीन  लड़कियां  हैं ,  जिनको  वह  मृत  मां  के  पास छोड़  गया  था  और  जिनकी  वजह  से  वह  दंड  भोग  रहा  है ।  वे  सब  स्वस्थ  हैं , सुंदर  हैं ।  उसने  पूछा  कि  क्या  हुआ?  यह  बूढ़ी  औरत  कौन  है ?  उस  बूढ़ी  औरत ने  कहा  कि  ये  मेरी  पड़ोसिन  की  लड़कियां  हैं ।  गरीब  औरत  थी ,  उसके  शरीर  में  दूध  भी  न  था ।  उसके  पास  पैसे-लत्ते  भी  नहीं  थे ।  और  तीन  बच्चे  जुड़वां । वह  इन्हीं  को  दूध  पिलाते-पिलाते  मर  गयी ।  लेकिन  मुझे  दया  आ  गयी , मेरे कोई  बच्चे  नहीं  हैं ,  और  मैंने  इन  तीनों  बच्चियों  को  पाल  लिया। 

अगर  मां  जिंदा  रहती  तो  ये  तीनों  बच्चियां  गरीबी ,  भूख  और  दीनता  और दरिद्रता  में  बड़ी  होतीं।  मां  मर  गयी , इसलिए  ये  बच्चियां  तीनों  बहुत  बड़े  धन-वैभव  में ,  संपदा  में  पलीं ।  और  अब  उस  बूढ़ी  की  सारी  संपदा  की  ये  ही  तीन मालिक  हैं ।  और  इनका  सम्राट  के  परिवार  में  विवाह  हो  रहा  है ।

भूल  मेदेवदूत  तीसरी  बार  हंसा ।  और  कारीगर  को  उसने  कहा  कि  ये  तीन  कारण  हैं । री  थी।  नियति  बड़ी  है ।  और  हम  उतना  ही  देख  पाते  हैं ,  जितना  देख पाते  हैं ।  जो  नहीं  देख  पाते ,  बहुत  विस्तार  है  उसका । और  हम  जो  देख   पाते हैं  उससे  हम  कोई  अंदाज  नहीं  लगा  सकते ,  जो  होने  वाला  है ,  जो  होगा ।  मैं अपनी  मूर्खता  पर  तीन  बार  हंस  लिया  हूं ।  अब  मेरा  दंड  पूरा  हो  गया  और  अब मैं  जाता  हूं ।

तुम अगर अपने को बीच में लाना बंद कर दो, तो तुम्हें मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी।

छोड़   दो   उस   पर  । वह   जो   करवा   रहा   है , जो  उसने   अब   तक   करवाया   है  , उसके   लिए   धन्यवाद  । जो अभी   करवा   रहा   है  , उसके   लिए   धन्यवाद । जो वह   कल   करवाएगा  , उसके   लिए   धन्यवाद  ।  तुम   बिना   लिखा   चेक धन्यवाद   का   उसे   दे   दो  ।   वह   जो   भी   हो,  तुम्हारे   धन्यवाद   में   कोई   फर्क न   पड़ेगा  ।   अच्छा   लगे  , बुरा   लगे  , लोग  भला   कहें ,  बुरा  कहें  , लोगों  को दिखायी   पड़े   दुर्भाग्य   या   सौभाग्य ,  यह  सब   चिंता  तुम  मत   करना ।

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