Home कविताएं “जरा सोचिए इस जीवन की विधा {

“जरा सोचिए इस जीवन की विधा {

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[1]

‘शराब  कड़वी  है  परंतु  जिंदगी  के  तजुर्बे  उससे  भी  कडवे  हैं  ‘,
‘ जवानी   में  बुढ़ापा  और  बुढ़ापे  में  जवानी  खूब  मिलती   है  ‘ |

[2]

‘शोहरत’ और ‘दौलत’ पर सभी नाज करते है ,कोई खास बात नहीं ‘,
‘मुकद्दर  का  सिकंदर   वही   है   जिसके   पास   सच्चा   मित्र   है ‘ |

[3]

‘ जब   हम   हंस   सकते   है  ‘ ‘ तो  रोये  क्यों  ‘,’
‘हंसने  का   मौका  मिला  है  ,’तो  खोये  क्यों ‘ |

[4]

“खामोशियों के जख्म गहरे निकले , जब भी  ढूँढने निकले ‘,
‘सिर्फ गंदी जबान ही जख्म करती  है ,भ्रम  टूट  गया  मेरा ‘ |

[5]

‘ तू  चाहे  कितना  भी  दिल  दुखा ,  मैं  शांत  ही  रहूँगा ‘,
‘समय बड़ा जालिम है , सही वक्त पर खुद जबाब दे देगा ‘|

[6]

‘खुन्नसों  के  दरबार  में  एक  दूसरे  की  बक्कल  उधेड़ी   जाती   है  ,’
‘आदमी आदमी से जलता है , दियासलाई  की  जरूरत  नहीं  पड़ती ‘|

[7]

‘जो  दर्द  को  समझते  हैं “, ” वो  दर्द  की  वजह  नहीं  बनते  कभी “,
“सिर्फ इंसान से प्यार करना सीखा है” “प्यार बांटना आदत है मेरी ‘|

[8]

यदि  विनाश  करना  है  तो  देश  में ‘आरक्षण ‘ तुरंत  लागू  कर  दो ,
‘अयोग्य  ऊँचे  पदो  पर   बैठ   जाएंगे ‘,’ विनाश  निश्चित  समझ  ‘|

[9]

प्रभु उवाच —-
‘ तू  पाप  करके  थक  गया  होगा  , मंदिर  में  आ  जाना ‘,
‘ अब  से  सुधरना  शुरू  कर  दे ‘,  ‘छमा  कर  दूंगा  तुझे ‘ |

[10]

‘कुछ  मजबूरियाँ  हैं ‘ कह  कर  पीछा  छुड़ाना  चाहते  हैं  ‘वो’ ,
‘ खुल  कर  क्यों  नहीं  कहते  ,  मैं  बेवफा  हो  गया  हूँ  अब  ‘ |

 

 

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