Home कविता “कड़ुवाहट भरी ज़िंदगी से उभारो ,सकारात्मक बनो ” |

“कड़ुवाहट भरी ज़िंदगी से उभारो ,सकारात्मक बनो ” |

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ज़िंदगी   की   शाम    में    शब्दों   का   खेल    है ,

संघर्ष    की   तपत    को   भूलते   जाओ , दोस्तों ,

चलो  उड   चलें  जहां   खुला  आसमां  नज़र  आए,

जहां  हर  घड़ी  किलकारियों  से  खेलते   हों   सभी ,

दुआओं   का   दरिया   हमारा   सूखने   न   पाये   कभी ,

मनमोहक व्यक्तित्व,विनीत स्वभाव,आदत बना डालो ,

आसमां  और  भी हैं,चुम्बकीय दृष्टिकोण उभारो अपना ,

कड़वाहट  भरी  ज़िंदगी  से  उभरो , सकारात्मक  बनो  |

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