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आंतरिक एकता सदा बनाए रक्खें

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?”रावण”जब;”रणभूमि” में, “मृत्युशय्या” पर,”अंतिम सांसे” ले रहा था,तब उसने,”श्री राम” से कहा :—–
?’राम :— “मैं”तुमसे,हर बात में,”श्रेष्ठ”हूँ।
?जाति, मेरी “ब्राह्मण”हैं, जो तुमसे, “श्रेष्ठ” है।
?आयु में भी,”तुमसे बड़ा” हूँ।
?मेरा,”कुटुम्ब” तुम्हारे, “कुटुम्ब”से, “बड़ा” है।
?मेरा,”वैभव” तुमसे, “अघिक” हैं।
?तुम्हारा महल, “स्वर्णजड़ित” है!! परन्तु;मेरी पूरी “लंका”ही,v”स्वर्ण नगरी” है।!!
?मैं ,”बल और पराक्रम” में भी, तुमसे,”श्रेष्ठ” हूँ।
?मेरा,”राज्य” तुम्हारे, “राज्य”से, “बड़ा” है।
?”ज्ञान और तपस्या” में , तुमसे “श्रेष्ठ” हूँ।
?इतनी,”श्रेष्ठताओं” के होने पर भी, “रणभूमि” में,”मैं” तुमसे” परास्त” हो गया।?
??सिर्फ इसलिये कि, “तुम्हारा भाई” तुम्हारे,”साथ” है, और “मेरा भाई” मेरे, “खिलाफ”…………..????
? बिना भाई के साथ के जब, “रावण” हार सकता है, तो हम, किस “घमंड” में है ..?
??सदा “साथ” रहिये, सदा” विजयी ” रहिये …..
अंदरुनी एकता बनाये रखो ।
?क्योकि :—-‘-
?”किसी भी,”पेड़” के “कटने”का, “किस्सा” न होता,
अगर”कुल्हाड़ी” के पीछे, “लकड़ी” का “हिस्सा”न होता ।”

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