Home कविता अब मुर्दे डरने लगे कहीं कफन बिक न जाए

अब मुर्दे डरने लगे कहीं कफन बिक न जाए

0 second read
0
0
1,397

*किसी कवि ने क्या खूब लिखा है।*
????
*बिक रहा है पानी,*
*पवन बिक न जाए ,*

*बिक गयी है धरती,*
*गगन बिक न जाए*

*चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं .,*
*डर है की सूरज की तपन बिक न जाए ,*

*हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति,*
*डर है की कहीं धर्म बिक न जाए ,*

*देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को ,*
*कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए ,*

*हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता,*
*कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए,*

*सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद,*
*डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए,*

*आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं*
*डरता है मुर्दा , कहीं कफ़न बिक न जाए।…..*

Load More Related Articles
Load More By Tarachand Kansal
Load More In कविता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

[1] जरा सोचोकुछ ही ‘प्राणी’ हैं जो सबका ‘ख्याल’ करके चलते हैं,अनेक…