Home ज़रा सोचो हम सभी को ‘खुश’ नहीं कर सकते , हाँ ‘दुख-दर्द’ आपस में बाट सकते हैं ‘

हम सभी को ‘खुश’ नहीं कर सकते , हाँ ‘दुख-दर्द’ आपस में बाट सकते हैं ‘

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जरा  सोचो
‘ यू  ‘ दुनिया ‘ जीने  को  जीती  है , ‘ खुशी ‘  से  जीती  रहे,
‘बस ‘आप’ किसी के ‘दर्द का कारण’ ना हो, ‘ऐसे कर्म करना’ !

[2]

जरा  सोचो
‘आनंद’  का  सभी  ‘आनंद’  लेते  हैं, ‘दुख’  सभी ‘अकेले’  झेलते  हैं,
‘काश समाज की ‘व्यवस्था’ बदल जाती, ‘ समभाव’ में जीते सभी’ !

[3]

जरा  सोचो
‘सुख  दुख’  तो  जीवन  के  साथी  हैं, ‘ परिपूरक ‘  हैं,
‘ रिश्ते’ खूबसूरती  से  निभाने ‘सीख’ लेनी चाहिए’ !

[4]

जरा  सोचो
‘सदा  उत्तम  कार्य  करो’  का  उद्घोष  करके ,  मैं  आगे  बढ़ता  रहा,
‘कभी  कुछ ‘गलत’ नहीं  किया, ‘कम  से  कम  इतनी  तो  तसल्ली  है’ !

[5]

जरा  सोचो
‘सारे  जमाने  को  ‘पढ़’  नहीं  सकते ,’हालात  बहुत  कुछ  ‘सिखा’ देते  हैं,

‘हालात’  हमारे  अनुसार  हो  जाएंगे , ‘बशर्ते  कुछ ‘सुकर्म’ तो  करते  रहें’ !

[6]

जरा  सोचो
‘कहते  हैं  ‘बिना  विचारे  जो  करे  सो  पाछे  पछताए’,
‘ सोच  कर’  बोलोगे  तो  फिर  ‘पछताना’  किसलिए ?

[7]

जरा  सोचो
‘ छोटा  जीवन, सीमित  शक्ति, समय  का  अभाव, न  जाने  क्या क्या करना  है ?
‘खाली  पुलाओ  मत  पकाओ , अकर्मण्यता  उचित  नहीं , कर्मशील  बने  रहो !
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