Home ज़रा सोचो ‘हमारे कर्म’,’शब्दावली’, और ‘सोच’, हमारा ‘भाग्य’ बदल देते हैं |

‘हमारे कर्म’,’शब्दावली’, और ‘सोच’, हमारा ‘भाग्य’ बदल देते हैं |

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जरा सोचो
नजर- नजर  में ‘बात’  समझ  जाएं, ‘आपसदारी’ वही  ठहरती  है,
‘हवा  में  बात’  पकड़ने  में  माहिर,  ‘दुश्मन’  भी  खूब  मिलते  हैं  !
[2]
जरा सोचो
‘ खूबसूरती’ चेहरे से नहीं,आपके ‘व्यवहार’ से ‘प्रतिलक्षित’ होती है,
चाहे  दिल  ‘चीर’  दो, चाहे  ‘जीत’  लो, ‘सिक्का’  तुम्हारे  हाथ  है !
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 जरा सोचो
हर ‘कोशिश’ की उसको ‘अपना’ बनाने की,’ बदनसीबी’ ने पीछा नहीं छोड़ा,
ना  हम  बदले, न  वह  बदले, ‘मुकद्दर  का  सिकंदर’  कोई  बन  नहीं  पाया !
[4]
जरा सोचो
हमें  तो  ‘खुले  आकाश’  में ‘विचरने’  की  इजाजत  चाहिए,
‘पिंजरे  का  दर्द’ क्या  है ? ‘जिंदगी-‘ ‘बखूबी’  जान  गई  है !
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जरा सोचो
किसी की ‘मुस्कुराहट’ के  कारण  बने  रहे  तो, ‘भाग्यशाली’  हो ,
‘सुकून’  घर  आ  जाएगा,  ‘अपाहिज’  सा  होकर  नहीं  ‘जियोगे’ !
[6]
जरा सोचो
हमारे ‘कर्म, शब्दावली, और सोच’, ‘भाग्य’ लिखते  हैं,
तुम  किस ‘सोच’  में  ढले  हो, खुद  ‘सोचकर’  बताओ ?
[7]
जरा सोचो
‘ सुधार ‘ का  प्रयास  ‘ प्रगति ‘  का  द्योतक  है,
‘सर्वमान्य  दृष्टांत’ को  स्वीकारना  ‘संस्कृति’ !
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जरा सोचो
जब  लोगों  पर ‘जवानी’ चढ़ती  है, ‘उम्र के पडाव’ भूल जाते  हैं,
‘ सीमा ‘  से  बाहर  कुछ  भी  करें ,  सिर्फ  ‘बंटाधार’  ही  होगा !
[9]
जरा सोचो
अगर  ‘कोई’  कील  बन  कर  ‘पैरों ‘  में   बार-बार  ‘चुभता’  हो,
या तो ‘हथोड़ा’ बन कर ‘ठोक’ दो, या अपना ‘पैंतरा’ बदल डालो !
[10]
जरा सोचो
‘बंद  आंखें’, ‘खामोशी’, ‘होठों’  पर  थिरकती ‘हल्की  मुस्कुराहट’,
‘दिल  के  राज’  खोल  देती  है, ‘जो’  ना  समझे  वह  ‘अनाड़ी’  है !
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