Home Uncategorized ‘साँसों’ का क्या भरोसा कब निकाल जाएँ ?,’ सत्कर्म की पूंजी जुटा’ , ‘आनंद में आ जाओगे ‘ |

‘साँसों’ का क्या भरोसा कब निकाल जाएँ ?,’ सत्कर्म की पूंजी जुटा’ , ‘आनंद में आ जाओगे ‘ |

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[1]

‘सांसे’ या तो ‘चलती’ है या ‘चली’ जाती है,
‘प्रथम’ नाम ‘जीवन’ है, ‘दूसरा ‘मृत शरीर’ है केवल’ !

[2]

‘यदि जीवन ‘रमजान’ की भांति जिए तो,’ईद’ कहेंगे सब,
‘अगर ‘चांडाल’ की फितरत है, ‘सब ‘भूल’ जाएंगे तुझे’ !

[3]
‘एक दिल’ जरूर है,
‘अनेकों दिलों में’ जगह बना जाऊंगा,
‘कितनी कोशिश करो ‘भूल’ जाने की,
‘यादों में समा जाऊंगा’
[4]
 ‘सदियों पहले ‘आदमी’ मरते थे,
‘आत्मा’ भटकती रहती थी,
‘आज लोगों की ‘आत्मा’ मर चुकी है,
‘खुद’ दर-दर भटक रहे हैं’ !
[5]
 ‘जब ‘दिल’ में जगह बनी,’हम शायद ‘खासम खास’ है उनके,
‘उनकी ‘बेरुखी’ रूबरू हो गई, ‘सोच’ बदलने को ‘मजबूर’ थे’ !
[6]
‘देख लेना, ‘बिना हक’ छीन लोगे तो,
‘महाभारत’ का ही जन्म होगा,
‘जब ‘जनहित’ में ‘अपना हक’ छोड़ोगे,
‘रामायण लिखी जाएगी’ !
[7]
मिलने का जो भी ‘पल’ मिले, ‘आनंद से गुजरना चाहिए,
‘कौन कब बिछड़ जाए ? ‘भला कौन जानता है इसको’ ?
[8]
‘मुसीबतें’ बिना बताए, न जाने क्या क्या ‘सिखा’ देती है ?
‘शांत रहना, कर्मठ वनना, निडर बने रहना, उन्हीं की देन है’ !
[9]
‘समय’ सही ना हो तो,’अच्छा’ भी सबकी नजर को ‘बुरा’ लगता है,
‘सही समय’ हो तो ‘बुरा आदमी’ भी ‘ठाठ’ से जी लेता है यहां’ !
[10]
‘ठीक है तुम इतने ‘अमीर’ नहीं,’जो ‘बीता समय’ खरीद सको,
‘इतने ‘ गरीब’ भी नहीं कि, ‘भविष्य’ को ‘सुंदर’ न बना सको’ !
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