Home ज़रा सोचो ‘सर्वप्रिय बनो’ ‘व्यभिचारी नहीं ‘, ‘ऐसे कर्म करो जो ‘तारीफ़ और इज्जत’ दोनों मिलें ” |

‘सर्वप्रिय बनो’ ‘व्यभिचारी नहीं ‘, ‘ऐसे कर्म करो जो ‘तारीफ़ और इज्जत’ दोनों मिलें ” |

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जरा सोचो
‘जिसको  जब  ‘मौका’  मिले , ‘ हर  घर  को ‘रोशन’  किए  जाना,
‘कोरोना’ कब  किसके  लिए ‘भूचाल’ ले  आए, ‘कह  नहीं  सकते’ !

[2]

जरा सोचो
‘अब  अपना  घर  ही ‘जेल’ सा लगने  लगा, तो  ‘मूर्ख  प्राणी’  है,
‘तुझे  ‘स्वर्ग’  की  दरकार  ही  नहीं , ‘पिशाच’  रूप  है  तेरा’ !

[3]

जरा सोचो
‘हर  घर  एक  ‘मंदिर’  है  ‘प्रभु’  का  गरिमामय  होकर  ‘ध्यान’  कीजिए,
‘दिल की लगी’ प्रभु  से ‘लगा’ ली  तो, ‘कारोना’  निश्चित ‘भाग’  जाएगा’ !

[4]

जरा सोचो
‘मन में ‘अनचाहा’ भर  कर ‘जीते’  हो,  ‘जी’  भर  कर  नहीं  ‘जीते’,
‘किसी दिन ‘लुटिया’ डूब जाएगी, ‘हाथ मलते” रह जाओगे जनाब’ !

[5]

जरा सोचो
‘कुछ ऐसा ‘काम’ करो, ‘तारीफ’ और ‘इज्जत’ दोनों मिले,
‘यह  ‘खामखा’  नहीं  मिलते, ‘सत्कर्म’ की ‘पूंजी’  लगा’ !

[6]

जरा सोचो
‘खुशियों’  को  तलाशना  ही  इंसान  की ‘बदहाली’  की  कहानी  है,
‘जैसा ‘जीवन’ मिला ‘स्वीकारते’  चलो, ‘हर पल  का ‘आनंद’  लो’ !

[7]

जरा सोचो
‘ यदि  एक  दूसरे  की’ ‘परवाह’ करते  जाएंगे,
‘जीने  का  आनंद’ बढ़ता  जाएगा,
‘रिश्ता’ बरकरार  रखने  का  यह ‘शगुफा ‘ है,
‘चाहे  जब  आजमा  लेना ‘ !
[8]
जरा सोचो
‘सर्वप्रिय  इंसान’  कभी  कोई  ‘व्यभिचारी’  नहीं  मिलता,
‘वही  इंसान  ‘हकीकत’ में ‘इंसान  की  श्रेणी’  में आता  है ‘ !
[9]
जरा सोचो
‘नफरत’  की  ऐसी  ‘फितरत’  है ,
‘तुरंत ‘महसूस’ होती  है  सबको,
‘प्यार’ का सही ‘एहसास’ कराने में,
‘उम्र  ‘खप’  जाती  है  हजूर’ !
[10]
जरा सोचो
”घाव’  खूब  मिले  परंतु  ‘खून’  एक  कतरा  भी  नहीं,
‘तुरंत समझ जाना ये ‘घाव’ किसी अपने ने ‘परोसे’ हैं’ !
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