Home कविताएं ‘ सत्कर्म की पूंजी “

‘ सत्कर्म की पूंजी “

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[1]

‘तू  कोई  गहरा  दरिया  नहीं  जो  डूबा  देगा  सबको ,’
‘तू बस सिर्फ एक जरिया है किसी के काम आता जा ‘ |

[2]

‘जीने  का  शौक  जरूर  है  परंतु  मर -मर  कर  नहीं ‘,
‘समझौते  करके  जिये  तो  क्या  जिये  तू  ही  बता ?

[3]

‘ हर  घर  में  इंसान  पैदा  होते   हैं   इंसानियत   नहीं  ‘,
‘इसे  पाने  हेतु  सत्कर्म  की  पूंजी  लगानी  पड़ती  है ‘ |

[4]

‘ रूठे   को  मनाना  सीख  गए , रोते  को  हंसाना  सीख  गए ‘,
‘टूटे को जोड़ना  भी सीखा , इंसानियत  का  तू  ही पैगंबर  है ‘|

[5]

‘औरत की इज्जत’ ,’सैनिक की जान ”कोड़ियों के दाम हैं यहाँ ‘,
‘बाकी सबकुछ मंहगा,खरीद नहीं पाओगे’ ‘खुद बिक जाओगे ‘|

[6]

मेरा विचार :-

 “यदि   आपके   आने   से   किसी   को   प्रसन्नता   अनुभव   नहीं   होती   तो   वहाँ   जाने   से   सदा   बचना   चाहिए

चाहे   वहाँ   कितनी   भी   सुविधाएं   उपलब्ध   हों “|

 

 

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