Home ज़रा सोचो ‘शारीरिक, मानसिक, आत्मिक विकास इंसान की जरूरत है — जरा सोचो |

‘शारीरिक, मानसिक, आत्मिक विकास इंसान की जरूरत है — जरा सोचो |

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[1]

जरा सोचो
‘ शांत  मन , कोमल  हृदय , गर्म  खून ,  तीक्ष्ण  बुद्धि ,
ये सफलता के ‘रहस्य’ हैं,’हाथ से अवसर” निकल नहीं जाए’ !

[2]

जरा सोचो
‘मन  के  रावण’ को  जला,’इच्छाओं’ को  घटाता  चल,

‘रोज  दूध  में  नहाता  है , ‘ मन  काले  का  काला  है ‘ !

[3]

जरा सोचो
‘सुविधाओं’  की  तलाश  में ‘जीवन’  गवा  दिया, ‘ सो ‘ नहीं  पाया,
‘अंतिम  घड़ी’ जब  तक  नहीं  आ’ई ,’हासिल’ नहीं  हुआ  कुछ  भी’ !

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जरा सोचो
‘ ‘स्त्री’  शारीरिक , मानसिक , आत्मिक, विकास  की  ‘श्रेष्ठ  सृजन ‘  है ,
‘मातृत्व  की  गरिमा’ की  पहचान  है ,उसकी ‘अवहेलना’ निंदनीय  है’ !

[5]

जरा सोचो
दोस्ती , वायदा , रिश्ता , दिल , और  विश्वास , ‘कभी  तोड़  मत  देना ,
‘टूटने  की  आवाज’ नहीं  आती, पर  ‘जालिम  दर्द’ बहुत  मिलता  है’ !

[6]

जरा सोचो
‘इच्छा’ कुछ  भी  करो, ‘प्रभु  की  इच्छा’ के  सामने ‘नतमस्तक’  रहो,
‘आदमी’ छोटा  नहीं  होता, सदा  ‘इस्तकबाल’  बुलंद  मिलता  है’ !

[7]

जरा सोचो
‘आनंद ‘  एक  एहसास  है , ‘ आजमा ‘  कर  देख  लो,
‘ जो  ‘एहसासों’ से खाली  है, ‘खुश’ रह  नहीं  सकता’ !

[8]

जरा सोचो
‘न  जाने  कब, कौन, ‘फन’ उठा  बैठे  ‘पूरे  भरोसे  के ‘जमाने’  लग  गए,                                                                                                                                  ‘सांपों  के  शहर’ में रहते  हैं,’फन’ कुचलने  का  हुनर ‘सीख’ लिया  है’ !

[9] 

जरा सोचो
‘भक्ति  समझ, परोपकार  करो , दीन  दुखियों  की  सेवा  करो,
:” प्रभु को ‘खुशामद’ नहीं  भाती, ‘कर्मकार’  बन कर  जियो’ !

[10]

 

‘ जिंदगी’ हर किसी को ‘उन्नति’ का एक ‘अवसर’ जरूर देती है,
‘ इस  ‘ मौके  का  इंतजार ‘ जरूर  करिए ,  तुरंत  भुनवाईये’ !

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