Home शिक्षा इतिहास ‘राजनीति का फंडा समझ से बाहर है ,सबकुछ गोल हैं वहाँ ‘ घबराने से क्या होगा ?

‘राजनीति का फंडा समझ से बाहर है ,सबकुछ गोल हैं वहाँ ‘ घबराने से क्या होगा ?

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[1]

‘इंसान  जोड़ – घटा , गुणा – भाग  करने  से  पीछे  नहीं  हटता,
‘पर प्रभु -सही  समय  पर  सबका हिसाब  बराबर  ही  करता  है ‘|

[2]

‘यदि  तुमने  अपना  चरित्र , सचरित्र  में  बदल  डाला ‘,
‘तुमसे  बड़ा  भाग्यशाली  कौन  होगा , सोचो  ज़रा ‘|

[3]

‘मैं  सियासत  हूँ ‘,घूर  कर  मत  देखिये हुज़ूर’,
‘ठीक  मौका  मिलते  ही  काया पलट  देती  हूँ ‘|

[4]

‘मैं  जालिम  सियासत  हूँ ,
‘लिहाज  बिलकुल  नहीं  करती’,
‘जहां  किनारा  दिखाई  देता  है ,
‘घूम  जाती  हूँ ‘|

[5]

‘गिलहरी  चाल  है  सियासत  की,सीधापन  सुहाता  नहीं’,
‘ पासा  पलटने  में  उसका  कोई  तोड़   नहीं   है ‘|

[6]

‘शैतानी  चाल  का  नाम  सियासत  है,
‘सफेदपोश  रहती  है ‘,
‘जहन  में  जहरीले  नाग  बसते  हैं ,
‘किसी  की  बपौती  नहीं ‘|

[7]

‘ धर्म – रोते  हुए  को  हंसाता  है , किसी  को  रुलाता  नहीं ‘,
‘धर्म  ही  हमारा  लोक  सुखी  और परलोक सुहेल करता  है ‘|

[8]

‘घबराओ  मत  , दुनियाँ  में  तुझे  पहचानने  वाले  भी  मिल  जाएंगे’,
‘तुम  तो ‘हीरा’ हो ,’जोहरी  की तलाश  जारी रख ,घबराने  से  कुछ  नहीं  होगा ‘|

[9]

‘जिनके  मन  में ‘अपनेपन ‘  का  भाव  है , ‘ प्यार  की  दौलत  लुटाते  हैं ‘,
‘प्रभु,प्यार  की  डोर  न  टूटे ,हम  ‘उत्तम भावना’  के  प्रतिरूप  बन  कर  जिये ‘

[10]

‘आसमां  से  जमीन’ पर  कैसे  लुढ़कते  है,
‘खुल  कर  देख  लिया  है  आपने,
‘समझ  लो  दिन  तो  सभी  के  बदलते  हैं,
‘सब्र  का  घूंट  पीने  की  जरूरत  है’|

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