Home ज़रा सोचो ‘योग्यता अर्जित करो, नम्रता ओढ़ो, ज्ञान का भण्डार बनों |

‘योग्यता अर्जित करो, नम्रता ओढ़ो, ज्ञान का भण्डार बनों |

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जरा सोचो
‘बच्चा’ पैदा  होते  ही ‘चिड़िया’ उसे ‘उड़ना’ सिखाने  लगती  है,

‘इंसान’ जन्म लेते ही ‘तेरे मेरे’ के चक्कर में जीवन ‘गंवाते’ हैं’ !

[2]

जरा सोचो
‘दूसरों के भरोसे’ जो जीता है ,कभी ‘सुखी’ नहीं पाया गया,
‘जिसने ‘सत्कर्म की पूंजी’ लगाई, ‘उन्नत’ होता ही गया !

[3]

जरा सोचो
‘बारिश  की  खुशबू’ मन  को ‘आनंदित’ करने  में ‘सुंदर  भूमिका’ निभाती  है,
‘उदासियों के मौसम’ खतम, ‘स्नेह’ का मौसम ‘जवान’ हुए बिना नहीं रुकता’ !

[4]

जरा सोचो
‘ जरा सी सरसराहट’ पर ‘निगाह’, ‘चौखट पर नजर,

‘ऊपर  से ‘कहते’  हो  मुझे  उनका  ‘इंतजार’  नहीं’ !

[5]

जरा सोचो
‘न  कभी ‘झुकना’ सीखा, न  ‘हां में  हां’ मिलाई किसी  की,
‘जब से ‘तेरी रजा’ में राजी रहने लगा, ‘आनंद’ से भरपूर हूं’ !

[6]

जरा सोचो
‘योग्यता’ अर्जित करो, ‘नम्रता’ ओढो, ‘ज्ञान’ का भंडार बनो,

‘अज्ञान’ होकर मत जीना, ‘इंसान’ की ‘औलाद’ हो, ‘इंसान’ बनो’ !

[7]

जरा सोचो
रोज  ‘बिखर- बिखर’ जाते  हो, ‘निखरने’  का  प्रयास  ही  नहीं,
‘अपने ‘रूप’ से क्या नीचोडोगे ? ‘धनुर्धर’ बनने की कोशिश तो कर’ !

[8]

जरा सोचो
‘जरा- जरा  सी  बात  पर ‘रुठन,’ ‘कठिन’ जीवन  बना  देगी,
‘पत्ता’ पेड़ पर ‘हरा’ रहता है, ‘झडते’ ही उसका जीवन खतम’ !

[9]

जरा सोचो
‘कई व्यक्ति’ दूर रहते भी ‘नज़दीकियों’ का ‘एहसास’ कराते हैं,
‘शायद ‘स्नेह  की  अनुभूति’ हर जगह ‘रंग’  बिखेर  देती  है’ !

[10]

जरा सोचो
‘सभी को ‘प्रसन्न’ नहीं कर सकते, ‘दुख’ देने की कोशिश भी मत करो,
‘स्नेह’ का  तालमेल  उनकी  ‘गुत्थियों’  को ‘सुलझा’  ही  देता  है’ !

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