Home ज़रा सोचो ‘मेरी सोच सामाजिक है , हर पल को समेट लेता हूँ ‘

‘मेरी सोच सामाजिक है , हर पल को समेट लेता हूँ ‘

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[1]

‘बदलते  समय  के  साथ ‘सामाजिक मूल्य’ भी  बदल  जाते  हैं ‘,
‘जो  कल  था  वो  आज  नहीं’,’जो  आज  है  कल  नहीं  होगा ‘|

[2]

‘तकदीर  बदलने  में  देर  नहीं  लगती’,’सिर्फ  समय  का  फेर  है ‘,
‘सुदामा  फटेहाल  बंदा  था’,देखते-देखते  महलों  का  राजा  बना ‘|

[3]

‘विपत्ति’  वो  कसौटी  है  जहां ‘ चरित्र  की  परख  होती  है ‘,
‘निडर  हो  कर जूझते  रहे  तो  तुम्हारी जीत  निश्चित  है ‘|

[4]

‘पहले  सबका  प्रयास  था’ ‘कहीं  इज्जत  पर  धब्बा  न  लग  जाए ‘,
‘ अब  जितना  बड़ा  धब्बा  उतना  बड़ा  रुतबा ‘,’ गरूर  है  सबका ‘|

[5]

‘जिंदा  रहते  तो  लोग  कुछ  न  कुछ कमियां  निकाल  देते  हैं ‘,
‘मरते  ही  न  जाने  कहाँ  से अच्छाई  प्रगट  हो  जाती  हैं  सबकी ‘|

[6]

‘भगवान ,नीम  सी  कड़ुवाहट  के  साथ,
‘ठंडी  छांव  भी  तो  देते  हैं ‘,
‘सुमरण  में  प्यार  से  लग  जा’,
‘वो’  सिर्फ  देता  है  कभी  लेता  नहीं ‘|

[7]

‘जब  किसी  को  कोई  उपलब्धि  मिलती  है,’
‘आलोचना’ साथ  चली  आती  है’,
‘कुछ  का  हाजमा  कमजोर  होता  है’,
‘उभरता  देख  आलोचना  पर  उतर  आते  हैं’|

[8]

‘अपनों  से  जंग  मत  करो ‘, हो जाए तो हारना सीखो ‘,
‘इस  हार  में  जितना  मज़ा  है’,’जीत  में  नहीं  होता ‘|

[9]

‘जीवन  है  तो  समस्या  भी  आएंगी ‘, ‘ हल  भी  निकलेगा’,
‘हलचल बनी  रहेगी तो ‘नये जमाने’ से मिलना  सीख  जाएंगे ‘|

[10]

‘हम  समस्याओं  को ‘बड़ी मुसीबत’ मानेंगे तो मुसीबत  ही  है ‘,
‘ अन्यथा  हर  अंधेरी  रात  के  बाद ‘ सूरज ‘  तो  निकलता  है ‘|

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