Home ज़रा सोचो ‘मुस्कराहट’,मधुरता’,धैर्य’, सत्य’ जीवन के ‘श्रंगार’ हैं , जीवन सुधारिए |

‘मुस्कराहट’,मधुरता’,धैर्य’, सत्य’ जीवन के ‘श्रंगार’ हैं , जीवन सुधारिए |

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जरा सोचो
‘मैं  मां  हूं, भूल  जाती  हूं_ गलती  भी  होती  है, याद  भी  नहीं  रहती ,
‘फिर  भी ‘बच्चों’ को  मना  लूंगी, ‘उलझनों’ से  मत  डरो, आगे  बढ़ो’ !

[2]

जरा सोचो
‘मुस्कुराहट’  सफल  जीवन  जीने  का  ‘सर्वोत्तम प्रारूप’  है ,
‘गलती’ से  भी ‘खो’ मत  देना  इसे, बहुत ‘पछताओगे’ यारों’ !

[3]

जरा सोचो
‘ मधुरता  और  सत्य ‘  हमारी  वाणी  के  ‘श्रृंगार’  हैं ,
‘जब भी बाहर निकले इस ‘श्रृंगार’ से ‘सुशोभित’ रहे’ !

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जरा सोचो
‘पाप कर्म’ आसानी  से ‘छिपता’  नहीं, ‘ताजा  दूध’ जल्दी  जमता  नहीं,
‘थोड़ा  समय  जरूर  लगता  है, ‘परिणाम’  दिए  बिना  ‘रुकता’  नहीं’ !

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जरा सोचो
‘दूसरों  के  प्रति  ‘वफादार’ बने  रहना , ‘ इमानदारी ‘  का  स्वरूप  है,
‘ खुद  को  ‘ सचरित्र ‘  बनाए  रखना ,  सबके  ‘ नैनों ‘  में  बसा  देगा’ !

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जरा सोचो
‘ न  किसी  की ‘ आंख ‘  में  पानी ,  न ‘ जज्बातों ‘  में  पानी ,
‘ सारे  देश  में ‘सूखा’ पड़ा  है ‘प्यार’ का, ‘अकाल’ सिर  पर  है’ !

[7]

जरा सोचो
‘ दुनिया’  रहने  का  स्थान  तो  है  ,’ दिल ‘  लगाने  का  नहीं,

‘प्रत्येक ‘संयोग” वियोग’ में बदल जाना, ‘प्रकृति’ का स्वरूप है’ !

[8]

जरा सोचो
जहां  ‘ हां ‘  कहने  की  जरूरत  थी  वही  देर  कर  दी ,
जहां  ‘ ना ‘ कहना  था  ‘जल्दबाजी’  में  हां  कर  दी ,
,हां ‘ करने  में  देर,’ ना  ‘करने  में जल्दी ,उचित  नहीं ,
अनेकों  ‘बार’  जरूरी ‘चीजें’  हाथ ‘से “फिसल जाती  हैं !
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 जरा सोचो
‘तमन्नाओं’  के  शहर  में  रहते  हो,’ मुसीबतें’  कम  नहीं  होंगी,
‘शांति  नगर ‘  में  रह  लेते  तो , ‘जीने  काम ‘  भी  ले  लेते ‘ !
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जरा सोचो
‘तैरना’  कभी  सीखा  नहीं, नदी  में  क्यों  ‘नहाने’  लगे,?
‘जब ‘डूबने’ लगे  तो  ‘चिल्लाए’ , ‘नदी’  बहुत  गहरी  है’ !
 
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