Home ज़रा सोचो ‘मुंह में राम बगल में छुरी , मुखौटा ‘राम’ का , कर्म लंकेश के ‘ |

‘मुंह में राम बगल में छुरी , मुखौटा ‘राम’ का , कर्म लंकेश के ‘ |

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जरा सोचो
‘उम्मीद’ की डाली को ‘सत्कर्म के पानी’ से ‘संचित’ करो,
‘सर्वदा  ‘प्रफुल्लित  चित्त’ ‘इंसानियत’  से  जोड़े  रखेगा’ !

[2]

जरा सोचो
‘ दुनियादारी’ ने  हमें  ‘भुक्कड़’ बना  कर  छोड़  दिया  है,
‘ वायदे’ रोज ‘भूल’ जाते हैं, ‘जाहिल’ बनकर ‘घूम’ रहे हैं’ !

[3]

जरा सोचो
‘सुख  हो  या  दुख’  प्रभु  का  धन्यवाद  करना  चाहिए,
‘दुख’ कुछ ‘सिखा’ जाएगा, ‘सुख’ में आनंद की ‘अनुभूति’ प्रबल !

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जरा सोचो
‘ हमें  अपनों  से ‘रूठना’ तो आता  है, परंतु  ‘मनाना’  नहीं  आता,
‘एकदम ‘जिद्दी’ हैं, चैन से ‘जीने की कला’ आज तक नहीं ‘सीखी’ !

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जरा सोचो
‘ मुंह’ में राम ‘बगल’ में छुरी, मुखौटा ‘राम’ का ‘कर्म’ ‘लंकेश’ के,
‘अब ‘कंस’ ‘गीता का उपदेश’ देते हैं, ‘राम’ का स्वरूप ‘नदारत’ है !

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जरा सोचो
‘किस्मत  के  द्वार’  पर  कभी  ‘ताला’  ‘शोभा’  नहीं  देता,
‘ बड़ों का सम्मान’ झोली भर देगा, ‘उदासी’ नहीं पसरेगी ‘ !

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जरा सोचो
‘ हुनर  का  अहम’  किसी  भी ‘कर्म’  का  नहीं  छोड़ता,
‘पत्थर’ अपने वजन के कारण ही, पानी में ‘डूब’ जाता है’ !

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जरा सोचो
‘अगर ‘दर्द’ को  ज्यादा ‘मुंह’ लगाओगे  तो ‘सिर’ पर  चढ़  जाएगा,
‘मुस्कुराना’ आदत है ‘मुस्कुराते’ ही रहिये, इधर उधर मत ‘झंंकिये’ !

[9]

जरा सोचो
‘जनता’  ही  ‘अपराधी’  है , ‘जुर्माना’  देने  के  लिए  ‘उत्तरदायी’  भी,
प्रशासन, निगम, सरकार, ‘जिम्मेदार’ नहीं, ‘वो’ सिर्फ ‘हलवा’ खाते हैं’ !

[10]

जरा सोचो
‘ दिल’ वह ‘जखीरा’ है जिसमें ‘मोहब्बत और नफरत’ दोनों बसते हैं,
‘ जब जैसा ‘एहसास’ जागता है, ‘नियती’ भी वैसी ही ‘जाग जाती’ है !

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