Home कविताएं धार्मिक कविताएँ मन ही’ ‘ शक्तिशाली शत्रु है’ , ‘मन के स्वभाव को समझो

मन ही’ ‘ शक्तिशाली शत्रु है’ , ‘मन के स्वभाव को समझो

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‘मन ही’ ‘ शक्तिशाली शत्रु है’ , ‘मन के स्वभाव को समझो’ ,
‘मन सदा’ ‘ भोगों की तरफ भागता है’ ,’ तृष्णा मे डूबा है ‘
‘त्याग’, ‘वैराग्य’,’ हठकर्म ‘ से ‘ तृप्ति’ और ‘ शांति ‘ तो मिलोगी ,
‘बस ईमानदारी से’ ‘ प्रभु की इबाबत कर’ ,’नाम कीर्तन मे डूब’ |

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