Home ज़रा सोचो ‘मतलब’ खतम तो ‘रिस्ते’ खतम ‘- किसी का कौन लगता है ?’- जरा सोचो |

‘मतलब’ खतम तो ‘रिस्ते’ खतम ‘- किसी का कौन लगता है ?’- जरा सोचो |

0 second read
0
0
600

[1]

जरा सोचो
‘ मैं ‘ अपनी ‘शर्तों ‘ पर जिंदगी जीने का बड़ा ‘शौकीन’ हूं,
अभी तक इतना ही ‘सीख’ पाया हूं ,आगे की ‘प्रभु’ जाने !

[2]

‘मतलब’  खतम  तो  ‘रिस्ते  खतम ‘ , किसी  का  ‘कौन’  लगता  है ?

‘मतलबी   दुनियाँ’  का  यह ‘ दस्तूर ‘ ,  अभी  तक  नहीं ‘ टूटा ‘ |

[3]

‘पत्थरों ‘ पर  नाम ‘ खुदवा ‘ कर  ,’ गिर ‘ मत  जाया  करो ,

ये  काम ‘ वही’ करते  है  जिन्हें  सस्ती  ‘दिखावट’  चाहिए | 

[4]

‘मैं  की  मटकी’  ‘अहं   के  शर्बत’  में  सरोबार   मिलती   है ,

इसका  ‘फूटना’, ह्रदय  के  ‘स्नेही  उदगारों’ का  प्रकट  होना  है |

[5]

बड़े  ‘तीरंदाज़’  निकले , ‘फरेब  का  प्याला’  पिला  कर  चलते  बने ,

काश | हाथ  मिलाने  से  पहले , तुम्हारा  ‘फलसफा’  पढ़ लिया  होता  |

[6]

‘गतिशील ‘  प्राणी   को  ‘मंज़िल   की   दूरी ‘ कभी  नहीं  सताती ,

वो  जानता  है  ‘रुक’  गया  तो  ‘पत्थर’, चलता  रहा  तो  सब  ‘सरल’  |

[7]

‘सुआचरण’ – ‘कल्याणकारी’  है ,  ‘रजोगुण’  दूर  भागते  हैं ,

‘पापों  का  आश्रय’  लेना  नहीं  पड़ता , ‘अधमरा’  हो  कर  नहीं  जीता |

[8]

अरे  हिन्दू  ‘मुर्गा  आसन’  सीख  ले , भविष्य  में  ‘मुर्गा’  ही  बनना  है ,

‘मिलजुल’  कर  रहने  की  ‘कवायद’  से  ‘उदासीन’  का  यही  ‘अंजाम’  होता  है |

[9]

‘बुढ़ापा’  आता  नहीं , ‘बच्चों  का  रवैया’  खींच   लता   है ,

‘स्नेह  का  सानिध्य’  का  ‘कमजोर’  होना, इसका  ‘पक्का  सबूत’  है |

[10]

जरा सोचो
‘मां-बाप  की  दुआओं’  के  ‘साए’  में  जीना  ‘अभागा’  नहीं  होने  देता,
‘आसमान की ऊंचाइयों’ को छुना, बड़ा ‘आसान’ हो जाएगा ,’आजमाइए’ !

Load More Related Articles
Load More By Tarachand Kansal
Load More In ज़रा सोचो

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

[1] जरा सोचोकुछ ही ‘प्राणी’ हैं जो सबका ‘ख्याल’ करके चलते हैं,अनेक…