Home Uncategorized ‘बेधड़क और ज़िंदादिल’ इंसान ही ‘सही जीवन’ को जीते हैं , सोचो जरा |

‘बेधड़क और ज़िंदादिल’ इंसान ही ‘सही जीवन’ को जीते हैं , सोचो जरा |

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जरा सोचो
‘सफलता’  मिले  या  ना  मिले, ‘काम’  सुचारू  चलना  चाहिए,
‘नतीजों’ की फिराक  में  रहे तो, बना बनाया ‘काम’ भी ‘चौपट’ !

[2]

जरा सोचो
‘सच  बातें’  ‘करेले’  की  भांति  ‘कड़वी’  लगती  हैं  सबको,

‘करेला’ ‘कड़वा’ जरूर है परंतु सेहत’ का ‘ध्यान’ रखता है !

[3]

जरा सोचो
जरा  ‘इश्क  की  पनाह’  मांगी  थी, ‘अनचाही’  विरासत  मिल  गई,
‘वीराना, आंसू, तन्हाई,आहें  और  नफरतों’ की ‘सौगात’ थी केवल’ !

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जरा सोचो
जब  तक  ‘खुद’  पर  न  ‘गुजरे ‘, ‘बातें’  समझ  में  नहीं आती,
कितनी भी ‘सहजता’ से बताओ,’गुड को गोबर’ बना डालते हैं’ !

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जरा सोचो
‘कर्मयोगी’ बनकर ‘श्रम’ की पताका फहराना, ‘चिरंजीवी’ बना देगा,
‘हाथ  की  लकीरों’  में  ‘रंग’  भरते  रहो , मन  का  ‘मयूर’  नाचेगा’ !

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जरा सोचो
न ‘सहनशक्ति’ न ‘समझ-शक्ति’ सिर्फ ‘सुखी’ रहने के ‘सपने’,
इंसान  का  ‘गजब  का  फंडा’  है, सभी  को ‘हलवा’  चाहिए’ !

[7]

जरा सोचो
‘धीरे और ठंडा’ करके ‘खाओगे’ तो, ‘मुंह’ नहीं जलेगा, ‘हजम’ भी होगा,
‘जल्दी’  ‘ज्यादा  गर्म’ और  ‘ज्यादा’ खाओगे  तो, ‘रामनाम  सत्य’  है !
[8]
जरा सोचो
बेधड़क,  जिंदादिली,  से  जो  मिला, ‘सभी  का’ हो  गया,
अब  ‘दिलों  पर  राज’ करता  है, ‘हर  घर’  का  वासी  है’ !
[9]
‘पहले  लड़कपन’ ,’  फिर  जवानी’ ‘ और  बुढ़ापा  आ  गया  है  अब’ ,
‘बचपन’ ‘ न  जाने  किन  वादियों  मे’ ‘गुम  हो  गया  है  आजकल’ ,
‘खिलखिलाना  बेवजह  अंदाज़  मे’ ,’ पुरानी  तस्वीरों  मे  जा छुपा’ ,
‘ज़िंदगी की’ ‘ इस वजह को  ढूँढता’ ,’ निरंतर  आगे  बढ़ रहा  हूँ  मैं’ |
[10]
 जरा सोचो
दूसरे  की  ‘नकल’ मत  करो, हर  कोई  ‘सर्वगुण  संपन्न’ नहीं  होता,
हो  सकता  है  किसी  की ‘नकल’ करके  तुम  ‘चांडाल’  बन  जाओ’ !
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