Home ज़रा सोचो ‘बुढ़ापे’ को ‘ जी ‘ लीजिये ‘बचपन’ में ढाल कर | कुछ ज्ञानवर्धक छंद |

‘बुढ़ापे’ को ‘ जी ‘ लीजिये ‘बचपन’ में ढाल कर | कुछ ज्ञानवर्धक छंद |

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जरा सोचो
बुढ़ापे  को  ‘जी’  लीजिए  ‘बचपन’  में  ढाल  कर,
‘बुढ़ापे’  की ‘मजबूरियां’, स्वयं  ही ‘ढल’  जाएंगी !

[2]

जरा सोचो
‘पौधों’ की भांति ‘हरा-भरा’ रहना है, तो ‘सुविचारों’ को प्रधानता दो,
‘रिश्ते’ महक जाएंगे’ जीवन का हर ‘प्रावधान’, ‘समाधान’ ही होगा !

[3]

जरा सोचो
‘अजनबी’  तो  दुनियां  में  अनेको  हैं, ‘आश्चर्य’  किस  बात  का ?
‘दर्द’ तो  तब  है  जब ‘जानबूझ’  कर  ‘अजनबी’  बना  रहे  कोई  |

[4]

जरा सोचो

‘ब्याही  बेटियों’  को  ही  केवल  ‘मेहमान’  समझने  वाले  दोस्तों,
अब  ‘बेटे’  भी  ‘मां- बाप’  से  विदा  हो  कर , ‘घर’  बसा  लेते  हैं !

[5]

जरा सोचो
(आज का जमाना )
जिन्हें ‘संभाला’ था, ‘ठीक’ होते  ही  यह  ‘फरमाया’ गया  हमको,
यहां  क्यों  ‘ खड़े ‘  हो  ?  ‘अपने  घर’  क्यों  नहीं  जाते  ?

[6]

 जरा सोचो
‘संयम’   चाहिए  तो  ‘मन  की  व्यवस्था’  को  ‘व्यवस्थित’  करो,
इस  कठिन  ‘व्यवस्था’  पर  ‘विजय’  मानव  बनाएगी  तुमको !

[7]

जरा सोचो
‘गलती’ हो या ‘गलतफहमियां’, ‘सुधरने के अवसर’ अनेक आते हैं ,
जहां  ‘सोच’  ही  गलत  हो ,  वहां  ‘ बंटाधार ‘  होना  सुनिश्चित  है |

[8]

जरा सोचो
किसी  को  इतना  मत  ‘सता’, परमात्मा  भी  ‘नाराज’  हो  जाए,
मानव  तो  ‘झेल’  भी  लेगा,  प्रभु ! ‘परिणाम’  से  ही  नवाजेंगे !

[9]

जरा सोचो
आपको  देखते  ही  ‘दर्द’ घट  गया, ‘बाछें’  खिल  गई,
कौन   रहता  है  ?  ऐसी  ‘ दवाइयां ‘  बहुत  ‘ महंगी ‘  है !

 

 

 

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