Home कविताएं उदासी की कविताएँ “बुजुर्गों का एकाकीपन -एक अहसास है “|

“बुजुर्गों का एकाकीपन -एक अहसास है “|

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आदरणीय  श्री  सत्य प्रकाश  पारीक  जी  के  सौजन्य  से :-

:- बुजुर्ग   आज   एकाकीपन   के   सन्नाटे      में  हैं   |   नई   पीढी अपना   पेट   भरने   या   धन   कमाने   की   होड़    में   घर    से   दूर ,  विदेशो        तक    में    पडी   है  ||  बुजुर्गो   के  ज्ञान    व   अनुभव   का   कोई   उपयोग         नहीं    हो   रहा   है   लगभग   सभी   बुजुर्ग   अपने   खालीपन   को    अपनी निर्थकता   को   ढो   रहे  हैं   |   इन्हीं   भावनाओं    को    व्यक्त   करती   अपनी          एक   कविता  आपके   विचारार्थ   प्रस्तुत   कर   रहा   हूँ  :-

बरगद   रोया —

 

बरगद  रोया  फूट  फूट  कर ,लख  उनके  उल्हास को
जब  अपना  घर  छोड़  परिन्दे, जाने  लगे  प्रवास  को |
कितना  रस  पीया  धरती  का, तब  ऐसा आकार  बना |
इतने  जीव  परिन्दो  का  घर, तब जाकर साकार  बना |
मीठी  मीठी  गोल  खिला  कर, भूखो  का  आहार  बना |
फिर  भी  क्यो  नही   दिल  का  रिश्ता, क्यो नही  दिल  का  प्यार  बना |
जो  भी  आया  मिटा  क्लान्ति, फिर  निकला  नयी  तलाश  को |
बरगद  रोया   फूट  फूट  कर, लख  उनके  उल्लास  उल्लास  को|
खुद  ने  सहे  प्रहार  मौसमी , उनको  दिया  सुखद  आवास |
ऑधी  झन्झा  सब  खुद  झेले, उनको  नही हुआ अहसास |
कितने आकर्षण आये, पर बरगद प्रण से टला नही |
कितनी ऑधी चली मगर, वो अपनी जड़ से हिला नही |
आग  लगे  ऐसे  आकर्षण,  ऐसे  अंध  प्रयास  को |
बरगद  रोया  फूट फूट  कर ,  लख  उनके  उल्लास  को
अपना  घर  तो  अपना  घर  है , जाने  वाले  पंछी  सुन |
हर  पल  नजरो  मे  आयेगा, अपने  मन  की  बाते सुन|
तूने  छोड़  दिया  तो  क्या, अब  नये  मुसाफिर  आयेगे |
जब  तक  छाव  सलामत  है , हम  फिर  से इसे बसायेगे|
कर्म  मार्ग  तो अग्नि पथ  है, यह नही  भोग  विलास  को |
बरगद  रोया  फूट  फूट  कर ,  लख  उन  के  उल्लास  को |

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