Home कहानी प्रेरणादायक कहानी “बहू और बेटियों के भेद मिटाएँ ! दहेज को तिलांजलि दें “|

“बहू और बेटियों के भेद मिटाएँ ! दहेज को तिलांजलि दें “|

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अपनी   सुसराल   का   हर   गम   छुपा   लेती  है  बेटी   माँ   के   सामने   आती   है   तो   मुस्कुरा   देती   है  |

बेटी   अज़ीम   लफ्ज़   है   जिसका   एहतराम   हो   और   जिसके   हक़   की   अदायगी   हो   वो   चाहे   घर    हो   या   ससुराल  ।  तब    ही    एक   बेहतर       समाज   का   ख्याल   मुक्कमल   होगा  |
देश   की   आधी   आबादी   के   लिए   आपसे   मेरे   सवाल   है   क्या   हम   पुरुष प्रधान   लोग   इस   आधी   आबादी   के   लिए   संज़ीदा   है  ? नए   सिरे   से   सोचना होगा  ?
ये   वही   है   जिसकी   कोख़   से   हम   पैदा   होते   है   जो   कभी   माँ  , कभी   बहन, कभी   बेटी ,  कभी   पत्नी   के   रूप   में   हमको   मिलता   है  । फिर   ऐसा   क्यों   है   की   देश   में   नारी   उत्पीड़न   के   अपराधों    के   मामलो   में   हर   वर्ष   बढ़ोतरी क्यों   ?


देश   में   चुनाव   नारी   सम्मान   के   लिए   लड़ा   जाए   और   रिजर्वेशन   बिल संसद   में   पास   ना   हो  | अपनी   बहन   बेटी   घर   पर   हो   फिर   भी   नज़र   दूसरे   की   तरफ   क्यों   उठती   है   ?  कही   न   कही   ये   कमी   हमारी   है   कि    हम   बच्चों   को   संस्कार   तो   देते   है   लेकिन   इन   संस्कारो   को   कभी    शामिल   नहीं   करवा   पाते   हैं   ।
ऐसे   में   गल्ती   एक   की  होती  है   और   भुगतना   समाज   को   पड़ता  है  ।


मैने   ब्याह   के   बाद   घरेलू   विवादों   को   देखा   समझा  है  | अक्सर   बेटी  – बहु     बन  कर  आती   है  , मिज़ाज़   को   ना   समझ  कर   सास   जो   कभी   बहु   बन    
कर   उसी   घर   में   आई   थी   वो   ही   अगर   कलह   के   मिज़ाज़   को   ना   समझे      तो   झगड़े   होते   है  | अब   ये   समझ   लो   की   महिलाओं    का   उत्पीड़न   महिलाओं   के   द्वारा   ही   ज्यादा   दिखाई   देता   है   ऐसे   कैसे   हो   सकता   है     की   जो   माँ   बाप –  बच्चों   को   अच्छी   सीख   देते   है   वो   ही   अपने   बेटों   को   पत्नी   के   हक़   से   क्यों   मुँह   फिरवाते   है   क्या   अगर   ये   बात   बहु   की   जगह   बेटी   की   हो   तो   क्या   ये   ही   सोच   रहती   है  ?


अच्छा   तो   ये   होता   की   बेटों    बेटियों   में   फर्क   ना   होता  | सबके   अधिकारों  की   रक्षा   होती   तब   जा  कर   हम   गर्व   महसूस   करते  |


आइये   दोस्तों   हम   सब   अपने   अंदर   बैठे   इंसान   को   जागरूक   करे  | मान     दें ,  सम्मान   लें  | 
बेटियों  ,   बहुओं  के  भेद   मिटाएँ   |   अपने   स्वार्थ   को   तिलांजलि   दें  |   देहज रूपी   जानवर    का     नामी   निशाँ   मिटा  दें   |   जय हिन्द ।

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