Home कविताएं “प्रभु , धर्म और तुम्हारी आस्था ” !

“प्रभु , धर्म और तुम्हारी आस्था ” !

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[1]

‘राधे ! मेरी  बांसुरी  ले  कर  क्या  करेगी’,’मैं  इससे  करोड़ों  को  लुभाता  हूँ ‘
‘मेरी  बांसुरी  वापिस  तो  कर ” ‘ अपने  स्नेह  से  भिगोये  रक्खुंगा  तुझे ‘ |

[2]

‘प्रभु-उनका ख्याल रखना जिन्होने मेरे लिए दुआओं का खजाना खोल रक्खा है’,
‘ मुझे  इस  लायक  जरूर  बना  देना ‘ , ‘ मैं  भी  उनके  काम  आता  रहूँ  ‘|

[3]

‘अपनी  चिंताओं  को  -माँ  की  पूजा  में ,परिवर्तित  कर  तो  सही ,’
‘दुर्गा  माँ  विघ्नहर्ता  हैं ‘,’आनंद  की  लहरें  बहा  देंगी  तेरे  लिए ‘|

[4]

‘दुनियाँ वाले बड़े बेवफा से हैं ‘,
‘अक्सर भरोसा तोड़ देते हैं ,’
‘दुर्गा माँ मुझे तेरी जरूरत है’,
‘इन बहकी फिज़ाओं से बचा लेना ‘|

[5]

‘दुनियाँ  चाहे  छोटी  पड  जाए ‘,’माँ  ‘का आँचल  छोटा  नहीं  पड़ता,’
‘सारी मुसीबतें  ले कर  माँ  के पास चला जा ‘आँचल  में  समा  लेगी ‘|

[6]

‘शुक्र  है  तेरा  खुदा’ , ‘इंसानियत  से  लबरेज  रखता  है  मुझे ,’
‘मैं धोखा देने वालों में नहीं’ ,’मैं -धोखा खाने वालों में शामिल हूँ ‘|

[7]

‘व्रंदावन का पहाड़ पत्थर का’ ,
‘लक्ष्मण बूटी का पहाड़ पत्थर का ,’
‘समुद्र में राम के पत्थर तैरे ,
‘पत्थर को ना पूजें तो क्या करें ‘?

[8]

‘जब  ईश्वर  की  छोटी  स्तुति  भी  कष्टों  से  बचा  लेती  है ,’
‘तू भीडचाल में क्यों फँसता है ,’क्यों जीवन  को  खोता  है ‘?

[9]

‘पहले नुकसान सहने की ताकत बढ़ा ‘,’फिर कमाई कर ,’
‘अगर ऐसा नहीं करता ,’खुदा भी माफ नहीं कर पाएगा ‘|

[10]

‘कुछ भला करने हेतु’ ‘भला दौलत की
‘क्या जरूरत है ‘?
‘सहयोग की दौलत लुटाये चल’ ,
‘सब भला करेंगे राम ‘|

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