Home कविताएं देशभक्ति कविता परहित से ऊपर उठो

परहित से ऊपर उठो

3 second read
0
0
1,149

‘परहित   से   ऊपर   उठ   ज़रा’  , ‘ देश   हित    भी    सोच    ले    ज़ालिम’  ,

‘यहीं    जन्मा ‘  , ‘ पढ़ा-लिखा ‘ , ‘ काम   किया ‘ , ‘जन्म -भूमि   है  ये  तेरी’ ,

‘लूट-खसोट’  , ‘बेईमानी’ , ‘नाइंसाफी ‘ से ‘ तेरा  पेट  नहीं  भरा   अब    तक ‘ ,

‘विचारों  में  शुद्धता’ ‘ क्यों  नहीं  आती ‘, ‘आत्मा  का  गला’  ‘क्यों  घोट  रक्खा  है’ ?

‘पेट  तो  रोटी  से  ही  भरता  है ‘ , ‘तू ‘ ‘गंदे  विचारों  का’  ‘भरा  तालाब   लगता  है’  ,

‘परहित   डकारे  जा   रहा  है    रात-दिन ‘ ,’ डायन  भी    एक   घर  छोड़  देती  है ‘,

‘जवानी  के  तूफान  में  मत  उड ‘ , ‘धीरे-धीरे  मौत ‘ ‘पीछे  आ  रही  है   जान   ले ‘,

‘कुंभिकरणी  नींद  में’  ‘सो  रहा  है  बेखबर’ , ‘जाग  जा’  ‘अब  जाग  जा ‘ बंधु  मेरे |

Load More Related Articles
Load More By Tarachand Kansal
Load More In देशभक्ति कविता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

[1] जरा सोचोकुछ ही ‘प्राणी’ हैं जो सबका ‘ख्याल’ करके चलते हैं,अनेक…