Home ज़रा सोचो ‘पतझड़ मत बनो गुलाब बनो,स्वस्थ रहो,सुरक्षित रहो,अहं में बेनकाब मत होना ” |

‘पतझड़ मत बनो गुलाब बनो,स्वस्थ रहो,सुरक्षित रहो,अहं में बेनकाब मत होना ” |

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[1]

‘ आज ‘ पतझड़ ‘  का  जमाना  है , बच  कर  चलो  यारों,
‘हरियाली का मौसम’ भी लहराएगा,’सांस तो ले लो जरा’ !

[2]

‘सारे  ख्वाब’  ठहरे  हैं,
‘तमन्नाओं’  का  सिलसिला  थम  गया,
‘जिंदगी’  अठ्ठहास  भी  नहीं  करती,
‘कफन’  सा  औढ  रखा  है’ !

[3]

‘गजब की रेस है, ‘रुकने’ वाला जीतेगा, ‘फुदकने’ वाला हारेगा,
‘आज के इस ‘मिजाज’ का, ‘घर में  ही  एहसास  होना  चाहिए’ !

[4]

‘ स्वस्थ  रहो , सुरक्षित  रहो , ‘ ‘कल ”  समय  भी  बदलेगा,
‘आज हर जगह ‘लाल बत्ती’ जली है,’कल हरी भी हो जाएगी’ !

[5]

‘कुदरत’  ने  इंसान  की  औकात  दिखा  दी,
‘घमंड’  छूमंतर  हो  गया,
‘आत्ममंथन’  करो, ‘सत्य’  को  स्वीकार  करो,
‘अंतर्यामी’  की  महिमा  अपरंपार  है’ !

[6]

‘जिसने  ‘संघर्ष’ किया  उसी  को, ‘कामयाबी  की  कीमत’ का  पता  है,
‘ बाकी  लोग’  उसे  सिर्फ  एक  ‘ भाग्यशाली  व्यक्ति ‘  समझते  हैं ‘ !

[7]

‘यदि ‘गुलाब’ की तरह  खिलने की  तमन्ना  है ,
‘ कांटों  से  नफरत ‘  नहीं  निभ  पाएगी ‘ !

[8]

‘ज्ञान’  से  गहरा  है , किसी  को  भी  समझ  जाना,
‘ज्ञानी’ बहुत  मिलते  हैं, ‘समझदारी’ सदा  गायब’ !

[9]

‘ दौलत ‘  मिली, ‘ शोहरत ‘  मिली , ‘ इंसान ‘  भी  बने  रहना,
अहं-भाव जागते ही किसी को, ‘बेनकाब’ होते देर नहीं लगती’ !

[10]

‘दौलत  की  अग्नि’  कई  बार  ‘प्रगाढ़  रिश्तो’ को  जला  डालती  है,
‘हे  दाता ! इतना  ही  देना  हमें, ‘सदभाव’  में  जीते  चले  जाएं ‘ !

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