Home ज़रा सोचो ‘नम्र व्यवहार ‘-‘ मजबूत रिस्तों ‘ की आधारशिला है | जरा सोचो | v

‘नम्र व्यवहार ‘-‘ मजबूत रिस्तों ‘ की आधारशिला है | जरा सोचो | v

0 second read
0
0
98
(1)
जरा सोचो
तेरा  ‘एहसास’-‘ एहसास’ कराता  है  तुम  मेरे  साथ  हो ,
कौन  कहता  है  ? हम  ‘अकेले’  हो  कर जी  रहे  हैं  आजकल |
(2)
जरा सोचो
‘नम्र व्यवहार’,  ‘मजबूत रिश्तो’ की  आधारशिला  है ,
वह ‘रिश्तो’ को  क्या  निभाएगा ,जो सदा  बरसाता  ही  ‘आग’  हो |
(3)
जरा सोचो
‘जिम्मेदारी’ उठाने  में  ‘तकलीफ’  आती  है, ‘सिखाती’ बहुत  कुछ  है,
‘आदमी  ‘हारता’ नहीं ,  ‘ संपूर्ण  व्यक्तित्व ‘  निखर  जाता  है  |
(4)
जरा सोचो
न ‘ सिर’  झुकाने  की  ‘आदत’  न  ‘आंसू’  बहाने  की  आदत ,
शिद्दत  से  ‘कर्मशील’  रहकर  केवल  ‘मानवता’  से  ‘स्नेह’  की  आदत !
(5)
जरा सोचो
‘जिंदादिली’  से  जीने  का  ‘शौक’ बरकरार  रखिए  जनाब,
‘बड़ी  उम्र’  के  पड़ाव  भी ,’ परास्त’ होने  से  नहीं  मुकरेंगे !
(6)
जरा सोचो
‘दुनियां’  बदलती  है , ‘कामयाब कर्मों’ की  ‘फेहरिस्त’ चाहिए,
‘नाकामयाब  लोगों  को  अपने ‘ फैसले’ बदलते  खूब  देखा  है |
(7)
जरा सोचो
”जीतने  की  जिद’  ‘परिस्थितियों’  को  बिगड़ने  नहीं  देती,
‘ठोकर’  तो  खा  सकते  हैं  परंतु ‘ उम्र’  थका  नहीं  सकती !
(8 )
जरा सोचो
‘ख्वाबों  का  जखीरा’  किसी  को  आराम  से  जीने  नहीं  देता,
यही  जीवन  का  ‘स्वांग’  है  जो  ‘गले’  से  उतारे  नहीं  उतरता !
(9)
जरा सोचो
‘गोबर’ बहुत  ढो  लिया , अब  ‘लाजवाब’ और ‘बेहतरीन’ की  प्यास  है,
न ‘राम’  बनना  है  न  ‘राम’ की  तलाश,  सही ‘इंसान’ बनने  की  तमन्ना  है !
(10)
 जरा सोचो
हर  हाले  सूरत  ‘मुस्कुराता’  हूं  तो , सब  ‘दर्द’  खिसक  लेते  हैं ,
‘रोनी  सूरत’  बदकिस्मती  लाती  है , ‘मैं’  कभी  ऐसा  नहीं  करता !
(11)
जरा सोचो
किसी  को  कितना  भी  ‘सुंदर  सुझाव’   दो, सब  ‘अपने  हिसाब’  से  चलते  हैं,
एक  ‘मेंढक’  को  ‘सोने  के  पालने’  में  बिठाया, कूद  कर ‘ नाली’  में  जा  गिरा  !
Load More Related Articles
Load More By Tarachand Kansal
Load More In ज़रा सोचो

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also

‘आपस में रूठे’ रहे तो ‘मनाने’ की ‘व्यवस्था खतम’ , ‘मिल कर जियो’ तो जीना है |

[1] जरा सोचो अगर  आपस  में ‘रूठे’  रहे, ‘मनाने’  की  व्यवस्था  खत्…