Home ज़रा सोचो ‘तुम भी खुश, हम भी खुश ‘ -‘खुशी का फुहारा ‘बहना चाहिए |

‘तुम भी खुश, हम भी खुश ‘ -‘खुशी का फुहारा ‘बहना चाहिए |

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[1]

जरा सोचो
‘सर्वगुण संपन्न’ कोई नहीं, कुछ ना कुछ ‘कमी’ सभी में है,
उन ‘कमियों’ को ‘नजरअंदाज’ करके,’मिलजुल’ कर जीने का प्रयास ही उत्तम !

[2]

मेरी सोच
” आप इसलिए ‘प्रसन्न’ मत रहें क्योंकि हर वस्तु ‘बहुत अच्छी’ है,

बल्कि इसलिए ‘प्रसन्न’ रहें क्योंकि आप हर वस्तु की ‘अच्छाई’ को भांप लेते हैं !

[3]

केवल  ‘असफलता’  से  नहीं , कामचोरी  से  बचने  का  प्रयास  भी  उत्तम ,

‘जुझारू  प्रवत्ति ‘- ‘ अव्यवहारिक ‘  प्रवित्तियों   को   समाप्त   करती   हैं  |

[4]

प्रातः काल  का  ‘सकारात्मक  विचार ‘,’ दिनचर्या ‘ सुखमय  बनाता  है ,

चलो ‘ सुविचारी ‘  बन   कर  आज   को ‘ स्वर्णिम ‘  कर   लिया   जाए  |

[5]

जीवन  के  खतरनाक  ‘ बिन्दुओं’  से   सभी   को  ‘अवगत’  रहना  चाहिए ,

‘सावधानी  हटी   दुर्घटना  घटी ‘ का ‘ शिलालेख ‘  जगाए  रखता   है  |

[6]

जब  ‘ तुम   भी   खुश ‘,’ हम   भी   खुश’ ,’खुशी   का  ‘ फुहारा’   बहना  चाहिए ,

चलो  ‘ नफरत   की   दीवार ‘ लांघे , ‘ चतुर्मुखी   समाज ‘  के   प्रहरी   बनें  |

[7]

कई   ‘ कामयाब ‘ हो   कर   भी   ‘मुस्कराते’   नहीं ,

‘ गुमसुम ‘  रहना   कदापि   उचित   नहीं   रहता  ,

कइयों  के  मसले  सुधरते  नहीं ,पर  मुस्कराते  हैं ,

‘हर  पल ‘ को  जीने  की  कला , पुछे   कोई  उनसे |

[8]

इच्छाओं  का  घड़ा  कभी   भरते   नहीं   देखा ,

यह  एक  ‘अत्रप्त’ , ‘जाग्रत’ , ‘अंवरत’  कहानी  है  सबकी |

[9]

भूलें  भी  होंगी, परेशानियाँ  आएंगी , चोट  लगेगी, बस  घबराना  नहीं  है ,

‘सतत  प्रयास ‘- ‘उत्क्रष्ट  परिणाम’  लाएगा , ‘गतिमान’  रहना  जरूरी  है  |

[10]

‘अपने  होठों  की   ‘मुस्कराहट’  सदा   ‘दहकनी’  चाहिए ,

हम  ‘शातिर  फिज़ाओं ‘ में  रहते  हैं , जरा  ‘हटकर’  चलें  |

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