Home Uncategorized ‘तन्हाई में ‘आस’ भी ‘गुनगुनाने’ लगती है | किसी का ‘दिल न तोड़ो’ जनाब |

‘तन्हाई में ‘आस’ भी ‘गुनगुनाने’ लगती है | किसी का ‘दिल न तोड़ो’ जनाब |

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जरा  सोचो

जरा  से  सरसराहट  पर  निगाह, चौखट  पर  नज़र ,

ऊपर  से  कहते  हो  मुझे  किसी  का  इंतज़ार  नहीं  |

[2]

जरा  सोचो

‘आस  में  उसकी , तनहाई  भी  गुनगुनाने  लगती  है  ,

यादों  की  खुशबू  बेचैन  करके  सही  जीने  नहीं  देती |

[3]

जरा  सोचो

मेरे  ‘प्यार  के  दर्द ‘ की  एक  तो  ही ‘ दवा ‘ है ,

‘मैं’  ‘तेरी  दवा’ ,’तू’  ‘मेरी  दवा’ ,  दोनों   ‘खफा’ ,

दोनों  के ‘ सलीके ‘  ‘सुधारने ‘ की  जरूरत   है ,

‘बेइन्तहा- नफरत’ किसी  के  ‘घर’ बसने  नहीं  देती |

[4]

जरा  सोचो

तुमसे  मिल  कर ‘ महकने’  लगा , ‘माँजरा’  क्या  है  ?

मेरी  ‘दुआओं ‘ का  ‘असर’  होने  लगा  है  आजकल  |

[5]

जरा  सोचो

चाह  कर  भी  नहीं ‘ भूल ‘ पाएंगे   तेरे ‘ किरदार ‘ को ,

‘आ जाओ’ ‘ दिल  का  मौषम’ बड़ा ‘सुहाना’ लगता  है |

[6]

जरा  सोचो

हम  उन्हें  ‘अपना’  समझते  रहे , वो ‘ नफरत ‘ करते   रहे ,

इस  ‘ईहापोह’ से  बहतर  था, ‘अनजान’ बन  कर ‘जी’ जाना |

[7]

जरा सोचो

न  कभी ‘ झुकना ‘ सीखा , न  किसी की ‘ हाँ  में  हाँ ‘ मिलाई ,

जब  से तेरी ‘रज़ा’  में  ‘राजी’  रहने  लगा, ‘आनंद’ से  भरपूर  हूँ  |

[8]

जरा सोचो

‘योग्यता’  अर्जित  करो, ‘नम्रता’  को  ओढ़ो, ‘ज्ञान  का  भंडार’  बनो ,

‘अज्ञान’ हो  कर  ‘मत  जीना’, ‘इन्सान  की औलाद’ हो ,’इंसान’ बनो |

[9]

जरा  सोचो

रोज़  ‘ बिखर-बिखर ‘  जाता  है , ‘ निखारने ‘  का  प्रयास  ही  नहीं ,

अपने  ‘रूप’ का  क्या  निचोड़ेगा,’धनुर्धर’ बनने  की  कोशिश  तो कर |

[10]

जरा  सोचो

अपनों  से ‘ दूर ‘ रह  कर  ‘नए  सपने’  रोज़  ‘संजाते’  हो ,

बड़ा  कठिन  कार्य’  पकड़  लिया , ‘ खुदा’  खैर   करे  |

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