Home ज़रा सोचो “जिस प्राणी के” दिल में दया ” उपजे , बड़भागी प्राणी है वो ” |

“जिस प्राणी के” दिल में दया ” उपजे , बड़भागी प्राणी है वो ” |

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जरा सोचो
‘तमन्नाओं’  के  समाज  में  ‘सही  सोच’  की  किसी  को ‘जरूरत’  नहीं,
‘ उल्टे-सीधे  कदम’ अधकचरे  होने  से ‘उत्थान  के  मार्ग’ बंद  रहते  हैं’ !

[2]

जरा सोचो
कदम  दर  कदम ‘सही’ चलते  रहे, ‘सलीके’  भी  सुधर जाएंगे,

‘नाउम्मीद’  रहना  स्वयं  को ‘धोखा’  देना  सरीखा  मान  लो’ !

[3]

जरा सोचो
‘अभिमान’  बाहर  छलकता  है, ‘स्वाभिमान’ आंतरिक  स्वरूप  है,
‘बाहरी  प्रलोभन’ त्याग  कर, ‘सिद्धांतों  पर  चलना’  सदा  उत्तम’ !

[4]

जरा सोचो
‘प्रेम’ चाहे ‘मानव’ से हो या ‘परमात्मा’ से, ‘प्रेम’ होता है,
‘जिनके  हृदय  ‘प्रेम’  उपजे, ‘धन-भागी’  है  वह  प्राणी’ !

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जरा सोचो
‘कम  बोलना’  फायदे  का  सौदा  है , फिर  भी  ‘बतियाते’  जाइए,
‘कभी कभी ‘रूठना’ भी अच्छा है, साथ सबको ‘हंसाते’ भी जाइए’ |

[6]

जरा सोचो
‘श्रद्धा’ न हो तो ‘विश्वास’ व्यर्थ है, ‘विश्वास’ ना हो तो ‘श्रद्धा’ भटकेगी,
‘विश्वास  और  श्रद्धा’  का  समन्वय, ‘बांधे’ रखता  है  सबको’ !

[7]

जरा सोचो
‘ हमें  भगवान  का  ‘दर’ और  भगवान  का  ‘डर’  दोनों  की ‘जरूरत’  है,
‘दर’  मिला  तो  ‘कृपा’  बरसेगी, ‘डर’  से  ‘गुनाह  करना’  भूल  जाएंगे’ !

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जरा सोचो
‘दीवारों’  पर  ‘शुभ  लाभ’  लिखने  से  कुछ  भी  नहीं  होगा ,
‘शुभ कर्म’ करके  सभी  का ‘शुभ’ सोचोगे  तभी ‘शुभ’ हो  पाएगा’ !

[9]

जरा सोचो
‘मास्क’  बड़ा  बेदर्द  है , सबकी  होठों  की  ‘मुस्कुराहट’  छुपा  दी  है,
‘जो काम’- ‘दर्द और जुल्मों’ का था ,अब धड़ल्ले से ‘मास्क’ करता है’ !

[10]

जरा सोचो
‘नदियां’ ‘समुद्र’ से  नहीं  मिलती, तो  इतना ‘विशाल’ नहीं  होता,
‘ हमारी  उन्नति’  भी  दूसरे  ‘लोगों  के  सहयोग’  का  प्रसाद  है’ !

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