Home कविताएं “जिंदगी को इस निगाह से भी देखिये जनाब “!

“जिंदगी को इस निगाह से भी देखिये जनाब “!

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[1]

‘सभी  परखते  हैं  सबको’ ,
‘समझने  का  प्रयास  नहीं  करते’,
‘आपस  में  एक  दूसरे  को  समझ  लेते’ ,
‘दूरियाँ  घट  जाती ‘|

[2]

‘किसी  को  कष्ट  देकर  मुस्कराते  हो’,
‘तुम  मानव  नहीं, ‘
‘किसी  के  दर्द  को  सहला  देते’ ,
‘आनंद  में  जीते ‘|

[3]

‘पहले  पूरा  मोहल्ला  परिवार  सा  था’ ,
‘दुःख-सुख  बाँट  लेते  थे ‘,
‘अब  एक  घर  में  तीन  कमरे  हैं ‘,
‘तीनों  भाई  पड़ोसियों  की  तरह  रहते  हैं  | 

[4]

‘ज्ञानी  हो  कर  अहंकारी  बन  गया’,
‘तेरा  सब  कुछ  खतम ‘,
‘नम्रता  का  आवरण  ओढ़  लिया  होता’ ,
‘तुझसा  प्राणी  कोई  नहीं  होता ‘|

[5]

‘जो  तुम्हारी  तकलीफ  में  काम  आता  रहा’,
‘उसी  को  भूल  गया ‘,
‘तू  आदमी  नहीं  घनचक्कर  है’, 
‘बेपैंदी  का  लोटा  है ‘|

[6]

‘हम  पागलों  की  तरह  सिर्फ  अपनी  खुशियाँ  तलासते  हैं ‘,
‘ओरों  की  मदद  करना  बहुत  टेढ़ी  खीर लगती  है  सबको ‘|

[7]

 ‘जरा  हिम्मत  करो , समाज  के  पिछड़ों  को  संभालने  लगो ‘,
‘आंतरिक  शांति  मिलेगी  ही ,’खुशी  का  भी  अंत  नहीं  होगा ‘|

[8]

‘दर्द  बताएं  तो  कैसे  बताएं’ ,
‘रोज़  नए  दर्द  मिलते  हैं ‘,
‘तुम  मुस्कराने  की  बात  करते  हो’ ,
‘अब  क्या  कहें  किससे  कहें’?

[9]

‘जिस  घर  में  माँ-बाप  दुःखी  हैं’ ,
‘उसे  मरा  हुआ  समझो ‘,
‘दया-भाव  और  स्नेह-भाव  जिसका  गया’ ,
‘जिंदा  भी  मरा  समझो ‘|

[10]

‘आपको  हर  खुशी  मयस्सर  हो’ ,
‘हर  पल  खुशगवार  ही  गुजरे ‘,
अपनी  हर  परेशानी  मुझे  दे  दो ‘,
‘हाजमा  बड़ा  मजबूत  रखता  हूँ ‘|

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