Home ज़रा सोचो “जाहिल मत बनो”,”शब्दों में शहद” और “दूसरों की गल्तियों” को भूलना सीखो ” |

“जाहिल मत बनो”,”शब्दों में शहद” और “दूसरों की गल्तियों” को भूलना सीखो ” |

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जरा सोचो
‘ याद ‘  करने  की  आदत  है , भूलने  का  रवैया  नहीं  अपना,
‘कोई ‘मौका’ नहीं ऐसा तुम्हें ‘अनदेखा’ करके ‘मस्त’ रहते हो’ !

[2]

जरा सोचो
‘ हम ‘  कैसे  भी  हो , ‘ शब्दों  से  शहद ‘  टपकना  चाहिए,
‘कर्कश वाणी’ का ‘प्राणी’ कभी, ‘सुखी जीवन’ जी नहीं सकता’ !

[3]

जरा सोचो
‘ बिजली ‘  कितनी  भी  गिरा  दो ‘ ? ‘ हम  पीछे  हटने  वाले  नहीं,
‘मोहब्बत’ की है ‘कबाड़खाना’ नहीं खोला, ‘जान’ हथेली पर रखते हैं’ !

[4]

जरा सोचो
‘लोग  बड़े ‘जाहिल’  हैं , किसी  की ‘मुस्कुराहट’ हजम  नहीं  होती,
‘घमंडी ,अहमभावी , बनावटी  आदि,’ जुमलों’  से  नवाज  देते  हैं’ !

[5]

जरा सोचो
‘गम’  तो  सभी  के  साथ  हैं , ‘ टेंशन ‘  किसलिए  पाली ?’
‘बिंदास ‘मुस्कुरा कर’ स्वागत करो,’स्वयं ही ‘घट’ जाएगा’ !

[6]

जरा सोचो
‘तेज  नजरों’  का  होना ‘उत्तम’,  परंतु  ‘ताकना’  सरासर  अनुचित,
‘शर्म-लिहाज’  भी  जरूरी  है, ‘बेपर्दा’  किसलिए  हो  जाते  हैं  हम’ ?

[7]

जरा सोचो
‘तुझे  ‘बोझ’  समझते  ही , अपने  भी  ‘नीचे’  गिरा  देंगे,
‘पत्तों’ के  सूखते  ही ‘पेड़’ भी, ‘उनको  तुरंत ‘झाड़’ देते  हैं’ !

[8]

जरा सोचो
‘तारीफ’  सुनकर  ‘कुप्पा’ मत  बनो,
‘ना  किसी  का ‘मजाक’  बनाओ,
‘यह  दोनों ‘गरूर’  के  सहयोगी  हैं ,
‘बीच  में  ‘डूबा’  देंगे’ !

[9]

जरा सोचो
‘आप  जरूर ‘आओगे’  इस  आशा  में ‘सारी रात’ करवटें  बदलते  रहे ,
‘मैं’  थी, एक ‘दीपक’  था , और  सिर्फ ‘तन्हाई’  में  आपकी  ‘यादें’ !

 

 

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