Home ज़रा सोचो ” जरा सोचो ” कुछ हमारे कुछ तुम्हारे “व्यवहार “को सुंदर बनाना चाहिए ‘ |

” जरा सोचो ” कुछ हमारे कुछ तुम्हारे “व्यवहार “को सुंदर बनाना चाहिए ‘ |

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जरा सोचो
‘जो ‘पास’  रहकर  भी ‘दूर’  हो , उनको  ‘पराया’  कहते  हैं,
‘जो ‘दूर’  रहकर  भी ‘जुड़े’ रहते  हैं,’अपनापन’ वहीं  पर  है’ !

[2]

जरा सोचो
‘दौलत’ बड़ी ‘बदनसीब’ है, उसे  पाकर  अपने  भी  ‘भूल’ जाते  हैं,
‘दर्द’  सही  ‘साहूकार’  है,  ‘इसे  पाकर अपने  ही ‘याद’ आते  हैं ‘ !

[3]

जरा सोचो
‘ दरिया  दिल ‘ स्वभाव ‘  सभी  के  ‘ दिल ‘  लूट  लेते  हैं ,
‘मौसम’ कितना भी ‘बदमिजाज’ हो, ‘ खुशनुमा’ बना देते  हैं’ !

[4]

जरा सोचो
‘ अध्यापक ‘ कान  खींचते  थे ,  मुर्गा  बनाते  थे , कमची  से  पीटते  थे ,
‘कोई ‘डिप्रेशन’ का  शिकार  नहीं  था, ‘अब  हर  कोई  इसका ‘शिकार’  है’ !

[5]

जरा सोचो
‘मां-बाप’  हर  ‘गल्ती’  पर  पीट  देते  थे,
‘फिर  भी ‘सम्मान’  कम  नहीं  हुआ,
‘अब ‘जरा  सी  बात’ पर  घर  छोड़  देते  हैं ,                                                                                                                                                                          ‘सम्मान  की  भाषा’  बदल  गई’ !

[6]

जरा सोचो
‘ पहले  ‘ दाल  रोटी ‘  खाते  थे, ‘ खून  की  कमी’  नहीं  होती  थी,
‘अब ‘ सब कुछ’ खाते  हैं, ‘खून की कमी’ से  परेशान  है  दुनिया’ !

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जरा सोचो
‘आपके  श्रीमुख  से  ‘ प्रार्थना ‘  निकलने  से  पहले , ‘ भगवान ‘  समझ  लेते  हैं,
‘यदि ‘श्रद्धा ‘ ही  नहीं, ‘उबाऊ  मन’  की  प्रार्थना, कैसे  स्वीकार  कर  लेंगे  प्रभु ‘ ?
[8]
जरा सोचो
‘ दगाबाजी ‘  करते  थका  नहीं , ‘ हर  कोई ‘ नफरत ‘  करने  लगा ,
‘कभी ‘खुदा की हाजिरी’  भी  लगा  देता, क्या  बिगड़  जाता  तेरा’ ?
[9]
जरा सोचो
‘चतुर्दशी का चांद’ स्त्री के ‘स्नेह’ की पराकाष्ठा है, जो बिना कहे ‘एहसास’ कराती है,
‘ आदमी ‘  कितना  भी  ‘ निष्ठुर ‘  हो ,  ‘ स्नेह ‘  में  डूबे  बिना  रह  नहीं  सकता ‘ !
[10]
जरा सोचो
‘ कीर्तिमान ‘ बन  गए  तो  ‘ हवा ‘  में  उड़ने  लगे  हैं  जनाब ,
‘सामान्य प्राणी’ ही रहो, ‘अन्यथा तुम स्वयं भी ‘उड़’ जाओगे ‘ !
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