Home ज़रा सोचो “जरा सोचो , आपकी सोच में कमजोरी कहाँ पर है “

“जरा सोचो , आपकी सोच में कमजोरी कहाँ पर है “

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जरा सोचो
‘ हर  बात  पर ‘भगवान  की  कसम’ खाते  हैं, ‘झूठ  पर  झूठ’ परोसते  है,
अगर  ‘कश्मे’  सच्ची  होती  तो, ‘ भगवान ‘  कभी  का ‘मर’  गया  होता’ !

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जरा सोचो
‘ लोग , वक्त  और  मौसम, ‘ बेमौसम ‘  बदलते  देखे  हैं,
‘  सदा  इनका ‘ इंतजार ‘  बड़ा  ‘ दर्द ‘ परोस  देता  है’ !

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जरा सोचो

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जरा सोचो
‘मोहब्बत’  की  थी ‘दुश्मनी’ नहीं , ‘अब  न  मरते  हैं  ना  जीते  हैं,
अब ‘अहसास’  हुआ, ‘फूलों’ की  चाहत  में ‘कांटे’ जरूर  चुभते  हैं’ !

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जरा सोचो
सुबह  को  मिला  ‘दर्द’  शाम  तक  ‘पुराना’  हो  गया,
ध्यान से देखा, अनेकों ‘नए दर्दों’ का पुलिंदा साथ था’ !

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जरा सोचो
‘ कोशिश’  करो  ‘ नीचे ‘  गिरने  का  अवसर  ही  नहीं  आए,
‘ एक  बार ‘नजरों  से गिरते’ ही  फिर उठना ‘महाभारत’  है’ !

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जरा सोचो
‘लोग  जीते  जी’  कभी  किसी  की  ‘कद्र’  ही  नहीं  करते,
‘मरते ही ‘कंधा’ लगा दिया, गजब की ‘फितरत’ है इंसान की’ !

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जरा सोचो
जिन  घरों  में ‘ बुजुर्गों  का  सम्मान’  यदि  ‘जिंदा’  है,
‘मार्गदर्शन’ मिलेगा, उनके ‘सुझाव’  का स्वागत करो,
न  उनकी ‘ उपेक्षा’ करो  न  कोई ‘अपेक्षा’  रखो  कभी,
उन्हें ‘दिल’ में  जगह  दो,’समय” दो,’आजादी’  भी  दो’ !
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 जरा सोचो
‘संयुक्त  परिवार’- ‘चरित्र  निर्माण’  और ‘समुचित  विकास’ की  पाठशाला  है,
‘ खर्चा  कम , उचित  बचत , ‘एकजुटता’  और  ‘संपन्नता’  बनी  रहती  है’ !
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