Home कविताएं ‘ख्याल अपना अपना ‘ कुछ सुविचार !

‘ख्याल अपना अपना ‘ कुछ सुविचार !

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[1]

‘प्रकाश   का   वजूद   अंधेरा  होने   पर  अहसास  होता   है’, 
‘सुरज  की  रोशनी  में  तो  सभी  घोड़े  की  तरह  चलते  हैं’ |

[2]

‘तुमसे  लगन  लगी  है  ‘दाता’  तुम्ही  रिस्तेदार  हो  मेरे’, 
‘दुनियाँ फानूस के ढेर पर विराजी है’ ‘कुछ भी नहीं अपना’ |

[3]

‘शिकवे  शिकायतों  से  भरी  पड़ी  है’ 
‘ज़िंदगी  सबकी ‘,
‘काश ! अपना  नज़रिया  बदल  लेते’ ,
‘खुश  हो  कर  जी  लिए  होते ‘|

[ 4]

‘खूबसूरती  कुछ  नहीं  करती’ ,’मन  का  अहसास  काम  करता  है ‘,
‘पवित्र स्थान पर जा कर मन का श्रंगार कर’,’सभी को अपना बना ‘|

[5]

‘बुरे  ख्याल  क्यों  जहन  में  आते  हैं  हमारी  समझ  से  बाहर  है ‘,
‘नम्र रहते  हैं ख्याल रखते  हैं  किसी का  कुछ  बुरा  न  हो  कभी ‘,
‘लगता है हमारी सोच कमजोर है, मन की व्यवस्था  स्थिर नहीं ,
‘हे प्रभु ! बुरे  विचारों से  पीछा छुड़ाने की  कृपा कर दो  हम  पर ‘|

[6]

‘जिंदगी  की  जिद्दोजहद  में  कोई  साथ  नहीं  देता  ‘तसल्ली  देते  हैं ‘,
‘हंस  के  जियो  चाहे  रो  कर ‘,अपनी  लड़ाई  खुद  लडनी  पड़ती  है’| 

[7]

 ‘समभाव  में  जीना  इंसानियत  का  तगाजा  है’, 
‘जो  अच्छे  समय  में  उछलते  है  और  बुरे  में  फिसलते  हैं’ 
‘कोई  दीन ईमान  नहीं  होता’ |

[8]

‘करोड़पति  बन  कर ‘जी’ चाहे  गरीब  बन  कर’ ‘सभी  की  राख  बनती  है’, 
‘सबकी खुशी  का कारण  क्यों  नहीं  बनता’ ‘जब  अंत  सब  का  समान  है’ |

[9]

‘कोशिश नहीं करोगे और तकदीर को कोसते रहोगे तो’ ‘बंटाधार हो गया समझो’,
‘खुद  को  झँझोड़ो  कुछ  न  कुछ  करते  रहो ‘ ‘ नसीब  स्वतः  बदलता  जाएगा ‘ |

[10]

‘रिस्ते’कभी शर्तों ,वायदों  प र  निर्भर  नहीं  होते’,’समभाव  के  छींटों  की  जरूरत  है’ ,
‘उन्हें  समझने  और  निभाने  की  कवायद  से ‘ ‘रूबरू  होने  की  नितांत  जरूरत  है ‘|

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