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“ख्याति प्राप्त लेखिका अमृता प्रीतम की अनोखी प्रेम कथा “

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 ख्याति  प्राप्त    लेखिका  अमृता  प्रीतम   और   इमरोज   की  अनोखी  प्रेम कथा…… अपेक्षा रहित, देह अतीत, Unconditional Love,

इमरोज़   अमृता   के   जीवन   में   काफी   देर   से   आये   !
अमृता   को   कभी-कभी   इस   बात   कि   शिकायत   भी   होती   थी !
इमरोज   से   कभी   कभी   वह   पूछती ,

“अजनबी   तुम   मुझे   जिंदगी   की   शाम   में   क्यों   मिले , 
मिलना   था   तो   दोपहर   में   मिलते  “

दोनों   ने   साथ   रहने   के   फैसला   किया   और   दोनों   पहले   दिन   से   ही   एक ही   छत   के   नीचे   अलग-अलग   कमरों   में   रहे   !

जब   इमरोज   ने   कहा   कि   वह   अमृता   के   साथ   रहना   चाहते   हैं   तो   उन्होंने कहा   पूरी   दुनिया   घूम   आओ   फिर   भी   तुम्हें   लगे   कि   साथ   रहना   है   तो  मैं   यहीं   तुम्हारा   इंतजार   करती   मिलूंगी.  ..!

कहा   जाता   है   कि   तब   कमरे   में   ही   सात   चक्कर   लगाने   के   बाद   इमरोज ने   कहा   कि   घूम    लिया   दुनिया …
मुझे   अभी   भी   तुम्हारे   ही   साथ   रहना   है   !

अमृता  , रात   के   समय   शांति   में   लिखती   थीं , 
तब   धीरे   से   इमरोज   चाय   रख   जाते   !
यह   सिलसिला    लगातार   चालीस   पचास   बरसों   तक   चला   !

इमरोज़   जब   भी   उन्हें   स्कूटर   पर   कंही   ले   जाते   थे..
तो   अमृता   की   उंगलियाँ   हमेशा   उनकी   पीठ   पर   कुछ   न   कुछ   लिखती रहती   थीं …!

और   यह   बात   इमरोज   भी   जानते   थे   कि   लिखा   हुआ   शब्द   “साहिर”   ही   है   !  ( “साहिर  लुधियानवी” मशहूर गीतकार, )

जब   उन्हें   राज्य   सभा   के   लिए   मनोनीत   किया   गया   तो   इमरोज़   हर   दिन उनके   साथ   संसद   भवन   जाते   थे   और   बाहर   बैठ  कर   उनका   घंटों   इंतज़ार करते   थे   !  अक्सर   वह   लोग   समझते   थे   कि   वह   उनके   ड्राइवर   हैं  !

यही नहीं इमरोज ने अमृता के खातिर अपने करियर के साथ भी समझौता किया, उन्हें कई ऑफर मिले, लेकिन उन्होंने अमृता के साथ रहने के लिए ठुकरा दिया !

गुरुदत्त ने इमरोज को मनमाफिक शर्तों पर काम करने का ऑफर दिया लेकिन अमृता को लगा कि वह भी साहिर कि तरहां उन्हें छोड़ ना जाएँ, इसलिए इमरोज़ ने ना जाने का फैसला लिया !

आखिरी समय में अमृता को चलने फिरने में तकलीफ होती थी तब उन्हें नहलाना, खिलाना, घुमाना जैसे तमाम रोजमर्रा के कार्य इमरोज ही किया करते थे !

31 अक्तूबर 2005 को अमृता ने आख़िरी सांस ली
लेकिन इमरोज़ का कहना था कि अमृता उन्हें छोड़कर नहीं जा सकती वह अब भी उनके साथ हैं !!

इमरोज   ने   लिखा  था..

‘उसने  जिस्म   छोड़ा   है , साथ   नहीं   !  वो   अब   भी   मिलती   है  ,  कभी   तारों  की   छांव   में  , कभी   बादलों   की   छांव   में ,  कभी   किरणों   की   रोशनी   में  कभी   ख़्यालों   के   उजाले   में  ,  हम   उसी   तरह   मिल  कर   चलते   हैं   चुपचाप , हमें   चलते   हुए   देख  कर   फूल   हमें   बुला   लेते   हैं ,  हम   फूलों   के   घेरे   में बैठ  कर   एक-दूसरे   को   अपना-अपना   कलाम   सुनाते   हैं  !!

*”उसने   जिस्म  छोडा   है  साथ  नहीं”*

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