Home ज़रा सोचो ‘खुद को तराशिए , खुद के दीपक बन समाज से जुड़िये “

‘खुद को तराशिए , खुद के दीपक बन समाज से जुड़िये “

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पिता —-
“हमारे  बीमार  होने  पर  पिता  पूरी  भागदौड़  करता  है” ,
“हर  हाल  में  खर्चे  पूरे  करने  में  पूरी  ताकत  लगाता  है” ,
” उस  बाप  को  सभी  नज़र  अंदाज़  किए  रखते  हैं “,
“हल्की  चोट लगते  ही”,’हाय  माँ’  ही “पुकारते  हैं  सभी” ,
“यह  बिल्कुल  सही  है  कि  ‘राम'” कौशल्या  के  पुत्र  थे” ,
” परंतु  तड़प  कर  मरने  वाला ” “पिता  दशरथ’  ही  था ” |
[2]
कम  बोलने  वाला  व्यक्ति  ही  काबिल  और  गंभीर  होता  है ।
ज्यादा  बोलने  का  मतलब  अपनी  उर्जा  को  खत्म  करना  है। 
[3]
‘खुद  को ‘तलाशने’  की  कोशिश  करता  तो,
‘शायद  ‘फरिश्ता’  बन  गया  होता,
‘सबमें  ‘ऐब’  ढूंढता  रहा, ‘गालियां’ खाता  रहा,
‘निकम्मा’  बनकर  रह  गया’!
[4]
‘न  जाने  किस-किस  के  ‘रोने’  पाल  रखे  हैं,
‘मन  की  उदासी’ कभी  ‘विदा’  नहीं  होती,
‘सूसंगति’ से  मन  की  ‘संडास’ निकल  जाती,
‘गुलाब’  से  दोस्ती  करता  तो  ‘महक’  जाता !
[5]
 ‘कर्म  का  दीपक’  जला ,’निकम्मा’ रहकर  क्या  होगा ?
‘एडी’ रगड़ता  मर  जाएगा,  ‘अभागा’ बनकर  जिएगा’ !
[6]
‘बीमारी’  एक  दिन  में  ठीक  नहीं  होती ‘ ‘धैर्य’ जरूरी   है ,
‘कुसंस्कार’ हो  या ‘कुविचार’, ‘निरंतर प्रयास’ की  जरूरत  है’ !
[7]
‘हमारी  पसंद’ हर  पल  बदलती  है,
‘हरि  रंग ‘ में  रंगते  ही  नहीं,
‘भक्ति  रंग’ जब  अपना  ‘रंग’  दिखाता  है,
‘मानव’  खुद  को  भूल  जाता  है’ !
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