Home कविताएं उदासी की कविताएँ ‘कोरोना संक्रमण’ से बचो , घर में कुछ दिन रहो , सब कुछ ठीक हो जाएगा |

‘कोरोना संक्रमण’ से बचो , घर में कुछ दिन रहो , सब कुछ ठीक हो जाएगा |

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[1]

‘ना  ‘फूलों’  की  भांति  ‘खिलते’  हो, ना  ‘खुशबू’  की  तरह  ‘बिखरते”  हो,
‘घिसट  कर’  जी  रहे  हो  आजकल, ‘ कारोना  की  दहशत’  भयानक  है’ !

[2]

‘बिना  किए ‘तंदुरुस्ती’ खराब  थी, ‘कामवाली’  ने ‘काम  करना’ सिखा  दिया,
‘हाथ  जोड़ना, नमस्ते  करना, बिना  रुके ‘करोना’  ही ‘सिखाता’  चला  गया’ !

[3]

कोरोना   का   कहर
‘हर  गाड़ी  पर’ लिखा  होता  था, ‘अंतर  बनाए  रखें’,
‘आज  यह ‘नियम’ हर  इंसान पर  ही  लागू  हो गया,
‘गजब की कारीगरी  है इस  परमपिता परमात्मा की,
‘ घर  का  धोबी ”अब  ना  घर  का  रहा  ना  घाट  का’ !
[4]
‘घर  में  रहकर  ‘थक  गए’ शायद, ‘तभी  बाहर  निकलते  हो,
‘कातिल  हवा’ से  उलझ  गए  तो, ‘लेने  के  देने  पड़  जाएंगे’ !
[5]
‘ मरना  सभी  का  निश्चित  है , ‘ बेवजह ‘ किसलिए  मरना  ?
‘बेमौसमी कातिल हवा’ को हवा देने,’ बाहर क्यों निकलते हो’ ?
[6]
‘किसमें  कितना  ‘धैर्य’  है,’ सभी ‘रूबरू’  हो  जाएंगे  इससे,
‘कारोना  की  दबिश’  बेदर्द  है, ‘लिहाज़’  ही  नहीं  करती’ !
[7]
‘क्या  तुम्हें ‘श्रेष्ठ  कर्मों  की  शीतलता’ की  जरूरत  नहीं ?
‘ उल-जलूल ‘  कामों  से  घिरे  रहते  हो, ‘डरते  ही  नहीं’ !
[8]
‘आपका  ‘व्यवहार  रूपी  चुंबक’  मनुष्य  को, ‘अपनी  ओर  खींच  लेता  है,
‘कसैला’ बनकर  कब  तक  जिएगा ? ‘बता ! कौन  कहेगा  आदमी  तुझको ?
[9]
‘यारब ! यह ‘प्यार’ ना  होता  तो, ‘दुनिया  का  जलवा’ नहीं  दिखता,
‘जो  जितना  दूर  होता  है , ‘ उतना ‘दिल  के  करीब’  मिलता  है ‘ !
[10]
‘कोरोना’  घात  लगाए  बैठा  है, ‘बाहर  निकले’  तो  चढ़  भी  सकता  है,
‘अपनों  को  रिझाने’  का  मौका  मिला  है , उनके  प्यार  में  ही  डूब  जा’ !
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