Home ज़रा सोचो ” कुछ सुविचार को शायद आपके काम आ जाएँ ” |

” कुछ सुविचार को शायद आपके काम आ जाएँ ” |

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[1]

‘हम  तो  तुम्हारे  अपने  हैं  फिर  भी  दिन-रात  झगड़ा,
‘यारों  जिनका  कोई  नहीं, वह  अपनों  के  लिए  तड़पा,
‘गिले-शिकवे सहित सब, समय के बहाव में बह जाएंगे,
‘कौन  कब  कूच  कर  गया  ? बस  ढूंढते  रह  जाओगे ‘
[2]
‘अपनी  गलती  पर  इंसान  वकालत  झाड़ता  है,
‘दूसरे  की  गलती  पर  जज : बन  जाता  है,
‘गलत  फैसला  करने  में  दिल  नहीं  घबराता,
‘सही  को  सही  बताने  में  सदा  कतराता  है !
[3]
‘तुम्ही’  मुझे  समझते  थे, और  तुम्ही  ‘गलतफहमी   के  शिकार’  हो  गए,
‘हर  बात ‘परखने  का’ अलग  अंदाज  है, कभी तो  सही ‘सोच’ लिया  होता !
[4]
‘अफसोस  है  हम  ‘दैनिक  व्यवहार’ में  कई  बार ‘मर्यादा’ लाँघ  देते  हैं,
‘जो ‘दूसरों  के  सम्मान’ का  ख्याल  रखते  हैं,’ वही  समुन्नत  प्राणी  हैं’ !
[5]
‘तुझे’  ढूंढता  हूं  पर  कहीं  ‘दिखते’  नहीं,                                                                                                                                                                              ‘एहसासों’  में  समाए  रहते  हो  प्रभु,
‘तेरी  कारीगरी  दाता’ करिश्मे  से  कम  नहीं,
‘बस इतनी  कृपा करना, भूल  मत जाना हमें’ !
[6]
‘अखलाकी  इंसान’ बमुश्किल  ही  मिलते  हैं  जहां  मैं  आजकल,
‘ करोड़ों  घूमते  मिल  जाएंगे , ‘ नकली  मुखोटे  चढ़ाए  हुए’ !
[7]
‘छोटा  जरूर  हूं  पर  दिन  रात  काम  करता  हूं,
‘मेरे  सब्र  की  इंतहा  मत  लेना  कभी,
‘मैं  जानता  हूं  ‘दिन  मेरा  भी  आएगा’ हालात  सुधरेंगे,
‘सब्र  का  फल  मीठा  होता  है ‘जानते  हैं  सभी’ !
 
[8]
 
‘अगर  शतरंगी  चाल  चले  तो , ‘अपनों  को  मारना ‘  बेहद  कठिन,
‘शुतुरमुर्ग’ बनकर  ‘मौका’ मिलते  ही, ‘हड़प  कर  जाओगे  सब  कुछ’ !
[9]
 
 ‘ बुढ़ापा  आ  गया  अब  क्या  करें ‘ इस  सोच  को  बदलो,
‘वह  दिन  तो  अब  चले  गए’ इस सोच  से  बाहर  निकलो,
‘केवल  अपने  घर  गृहस्थी  से  जुड़ी  बात  करते  हो,अनुचित  है,
‘खुद  को  सुधारो,ऐसी  कला  सीखो जो  दूसरों  को आकर्षित  करें’ !
[10]
‘हर  समय  ‘मुंह  चलाने  वाले’ अक्सर  ‘जल्दबाज’ होते  हैं, ‘हड़बड़ी’  में  रहते  हैं,
‘जिंदगी  से  ‘ संतुष्ट ‘ नहीं  होते, ‘ खुश  रहना, ‘आदत  में  शामिल  नहीं  होता’ !
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