Home ज़रा सोचो “कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं जीवन ” कुछ छंद !

“कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं जीवन ” कुछ छंद !

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[1]

‘जब  जब  सफलता  की  कहानी  सुनाई  जाएगी ,
‘रोंगटों  में  रवानी  दौड़  जाएगी’ ,
‘क्यों  न  हम  भी  कुछ  ऐसा  करें’ ,
‘याद  करते  रह  जाएँ  सभी “|

[2]

‘मैं  इतना  समझदार  नहीं’,
‘जो  किसी  को  सलाह  दे  पाऊँ ‘,
‘मैंने  भी  गल्तियाँ  की  हैं’ ,
‘बहुत  दर्द  झेले  हैं ‘|

[3]

‘एक  गुब्बारा  पा  कर  खुश’,’ दूसरा  बेच  कर  खुश’,’तीसरा  फोड़  कर  खुश ‘,
‘तीनों  की  मनस्थिति  विभिन्न  थी’ ,’तीनों  प्रसन्न  थे’ ,’क्या  कहें  इसको ‘?

[4]’शब्दों  से  इतिहास  भरा  पड़ा  है’ ,
‘झाँकता  भी  नहीं  कोई ‘,
‘लिखे  शब्द  अगर  मन  खुश  करें’ ,
‘तो  उनका  अर्थ  है ‘|

[5]

‘तर्क – संगत  झूठ  के  बलबूते  अगर  बूंद मोती  बन  जाए  तो  क्या  बुराई  है,
‘अश्वत्थामा  हतो’ कह  कर  कृष्ण  ने कल्याण  का  मार्ग  प्रशस्त  किया  था “|

[6]

‘सच  और  झूठ’  का  संबंध  ‘प्रकाश और  अंधकार’  की  तरह  है ‘,
‘प्रकाश  होने  पर अंधकार ‘ व’अंधकार होने  पर प्रकाश ‘नदारत ‘|

[7]

‘जो  सोचते  हैं , बोलते  है ,वह  करते  नहीं,
‘यही  दंश  सबको  डसे  जा  रहा  है’,
‘हम  जंगली  जड़ी-बूटी  सरीखे  हैं,
‘उगे  तो  हैं  पर  किसी  काम  के  नही’ |

[8]

‘किसी  पर  भार  मत  बनो’ ,
‘स्रजनात्मक  रहने  में  भलाई  है’,
‘जब  सूखे  पत्तों  को  पेड़  झाड  देता  है’,
‘अपने  भी  गिरा  देंगे  हुज़ूर ‘|

[9]

‘जिंदगी  से  शिकायतें  बहुत  थी’ ,
‘कसमसा  कर  जी  रहे  थे  हम ‘,
‘कोई  जाँबाज़  नहीं  मिला’ ,
‘खुद  हिम्मत  दिखाई  तो  आगे  बढ़ा ‘|

[10]

‘बेटा  अक्सर  सिर्फ  बेटा  है,
‘हर  हक  जमाने  के  लिए’,
‘बूढ़े  माँ-बाप  की  अच्छी  बहू  ही
सर्वोत्तम  सहारा  है ‘|

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