Home कविताएं “कुछ उत्तम सोचें तो समाज का कल्याण ही होगा ” !

“कुछ उत्तम सोचें तो समाज का कल्याण ही होगा ” !

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[1]

‘विश्वास  वह  गोंद  है  जिससे  जीवन  के  मूलभूत  सिद्धान्त  जुड़े  रहते  हैं ,’
‘ क्यों  न  आपस  में  विश्वास  जगाएँ  , विश्व – कल्याण  की  सोचें  सभी ‘|

[2]

मित्र -तो प्रेम  से  भरे  रहते  हैं ‘,’आभार की जरूरत कहाँ हैं ‘?
‘अपने  स्नेह  से  भिगोये  रखते  हैं ‘,’ इतना  भी  काफी  है ‘|

[3]

‘लोग  तो  कमियाँ  भगवान  में  भी  निकालने  में  देर  नहीं  करते ,’
‘बिना तारीफ की उम्मीद किए’ ,’मन की संतुष्टि के काम करते रहो ‘|

[4]

‘व्यस्त  जीवन  में  प्रार्थना  करने  का  बमुस्किल  समय  मिलता  है ,’
‘लेकिन  तय  है  थोड़ी  सी  प्रार्थना  भी  जीवन  आसान  बना  देती  है ‘|

[5]

‘हमारी  तमन्ना  नहीं  चाहे  किसी  को  रुलाएँ  या  भुलाते  रहें ,’
‘बस जिस सिद्दत से हम याद करते हैं’ ,’हम भी याद आयें उन्हें ‘|

[6]

कान्हा उवाच —
‘ठुमक -ठुमक  कर  नाचने  की  आदत  है  मेरी , मस्त  रहता  हूँ ,’
‘ हर  दिल  मे  जगह  बना  लेता  हूँ  , ‘सभी  को  मस्त र खता  हूँ ‘|

[7]

‘अहसान करके रिस्ता बनाया तो ,’क्या तीर चलाया है तुमने ,’
‘लाजबाब रिस्तों की फहरिस्त’,’अहसासों की मोहताज होती है ‘

[8]

‘हक  की  रोटी  मिले  केवल ‘ ,’ ऐसी  कृपा  कर  दो  प्रभु ‘,
‘किसी और के सामने हाथ न फैले’ ,’बस इतनी तमन्ना है ‘|

[9]

‘रिस्ता  गलतफहमी  का  शिकार  हो  गया’ ,’तो  टूट  गया  समझो ,’
‘रिस्ता  बनाए  रखने  के  लिए’ ,’सहनशक्ति  होना  बेहद  जरूरी  है ‘

[10]

‘विधाता  तकदीर  को  अनचाहे  व  अनजाने  रंगों  से  सज़ा  देता  है ,’
‘मनचाहे रंगों ‘ से  सजाने  के लिए ,कर्मकार  बनना  बेहद  जरूरी  है ‘|

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