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कलियुग की माया घर बसने ही नहीं देती

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‘ज्ञान’ ‘एक कान से सुना’ तो ‘दूसरे कान ‘ से ‘ निकल ‘ जाता है ,
‘कहावत है’ -‘जो सहज मिले’ ‘वह दूध बराबर’ ,’ ठीक ही है’ ,
‘लोग आजकल’ ‘सबकुछ समझते ‘ हैं ,’बस दिखावा ‘ करते हैं ,
‘कलयुग की माया’ , ‘अच्छी बातों को’ ‘ घर बसाने ‘ ही ‘नहीं देती’ |

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