Home ज़रा सोचो ‘ईमानदार कमाई’ से ‘स्नेह’ और ‘भरपूर खुशियाँ’ नसीब होती हैं |

‘ईमानदार कमाई’ से ‘स्नेह’ और ‘भरपूर खुशियाँ’ नसीब होती हैं |

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जरा सोचो
‘ईमानदार कमाई’ से ‘स्नेह’ और भरपूर ‘खुशियां’ नसीब होती हैं,
‘बेईमानी’ से कमाई ‘दौलत’ के साथ ‘पाप और चिंता’ साथ आते हैं !

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जरा सोचो
न असली ‘ रुद्राक्ष ‘ मिलता है, न सही ‘ संगत ‘ का स्वरूप,
दोनों में ‘रूहानी’ ताकत है, ‘कायापलट’ में देर नहीं लगती !

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जरा सोचो
जिस ‘ नजर ‘ का इंतजार था , जब भी ‘ हम ‘ पर पड़ी,
लबों से ‘मुस्कुराहट’ लिपट गई, ‘ दिल’ बाग- बाग हो गया !

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जरा सोचो
‘झगडे और गुस्से’ से बच कर, ‘कर्णप्रिय’ बोलने की सलाह है,
सभी ‘ अप्रिय घटनाओं ‘ पर ‘ पटाक्षेप ‘ होना सुनिश्चित रहेगा !

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जरा सोचो
‘सफलता’ और ‘गहरे रिश्ते’, ‘उन्नत मस्तिष्क’ की उपज नहीं,
यह दोनों आपके ‘सुव्यवहार’ और ‘सुविचारों’ का कमाल है !

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जरा सोचो
‘जिन्हें-‘ ‘केला’ लाने को कहा , ‘ करेला ‘ खरीद कर लाए,
‘वो’- ‘कृषि कानून’ पर रोज ‘नारे’ लगाते हैं, गजब ‘इंसान’ हैं !

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जरा सोचो
मां , बेटी , बहन , पत्नी , बहू , लक्ष्मी , ‘ मां ‘ के ‘ स्वरूप ‘ हैं ,
अपनी ‘कमजोर सोच’ में कैद करके ‘जुल्म’ ढाते हो उन पर,
उनकी सही ‘व्याख्या’ और ‘ताकत’ का ‘एहसास’ तो करिए,
‘आंतरिक आनंद’ को ताकत तो दीजिए, सारी ‘व्यथा’ खतम !
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जरा सोचो

बातों को ‘याद’ रखना ‘तीव्र मस्तिष्क’ का कमाल है, बहुत अच्छा है,
परंतु ‘ बुरी बातों ‘ को ‘ भूल ‘ जाना उसे भी अधिक ‘ उतम ‘ !
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जरा सोचो
मंद मंद ‘मुस्कुरा’ कर ‘घायल’ कर दिया उसने, हम ‘सोच’ ही नहीं पाए,
जब ‘ समझ ‘ में आया तब तक , वह ‘ दिल ‘ में जगह बनाए बैठे थे !
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जरा सोचो
‘स्नेह की कशिश’ ‘मुरझाने’ नहीं देती ,’नफरत की आग’ ‘खिलने’ नहीं देती !
जो करना है ‘ तुम्हीं ‘ सोच कर बताओ , ‘ जीवन ‘ तुम्हारा है !
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जरा सोचो
अपनों के ‘लहजे’ जब ‘चुभते’ हैं, ‘अधीर’ हो जाते हैं हम,
‘ और ‘ तो ‘ और ‘ हैं , उनका ‘ बुरा ‘ क्या मानना ?
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