Home ज़रा सोचो “इंसानियत की तलाश आज भी जारी है ‘|

“इंसानियत की तलाश आज भी जारी है ‘|

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‘विचारमग्न  होने,गंभीर  चिंतन  करने, गहराई  में  उतरने  की  जरूरत  है ‘,
‘विचार  ही  जीवन  को  बनाने  अथवा  बिगाड़ने  का  स्थायी  आधार  हैं ‘|

[2]

‘जरा  बताओ  कितने  पलों  को  आपने  समाज  के  लिए  उपयोगी  बनाया  है ‘,
‘कितने  पल  नेकी  करी  और  कितने  पल  मीठा  बोल  कर  बिताए  हैं ‘|

[3]

‘परमात्मा  का  बोध  है  तो  बसंत  है,
‘विमुख  है  तो  आनंद  नहीं  होगा, 
‘अपने  मूल्यवान  जीवन  की  कद्र  कर, 
‘क्यों  कोड़ियों  के  दाम  बेच  रक्खा  है |

[4]

‘खिलोनों  के  बजाय  जज़्बातों  से  खेलने  लगा , गजब  इन्सान  है ‘,
‘बेसुरे  राग  गाता  है  इसीलिए  ,  इतनी  भीड़  में  भी  अकेला  है ‘|

[5]

‘हकीकत  का  सबको  पता  है’, 
‘साथ  में  किसी  के  कुछ  नहीं  जाता ‘,
‘इंसानियत  ढूंढते  सारी  उम्र  निकल  गयी’,
‘आज  भी  तलाश  जारी  है ‘|

[6]

‘क्यों  हर  किसी  से  पूछते  हो , जिंदगी  भर  क्या  किया  उसने ‘,
‘कुछ किया  या नहीं -पता नहीं ,बस  किसी को  धोखा  नहीं  दिया ‘|

[7]

‘किसी  को  सम्मान  देना  भी’ ,
‘स्नेह  की  श्रेणी  में  आता  है ‘,
‘स्नेह  में  ढ़ोल  नहीं  बजते’ ,
‘अहसासों  की  डोर  है  केवल ‘|

[8]

घबराना -नकारात्मकता  की  शैली  का  सोपान  ही  मानो ‘,
‘निडर  हो कर  आगे बढ़ो ,’मेहनत कभी  बेकार  नहीं जाती ‘|

[9] 

‘अनेकों – दिल  की  दिल  में  रखते  हैं ‘,
‘खुलते  ही  नहीं ‘,
‘जब  कोई  खुलकर  जीना  ही  नहीं  चाहे’ ,
‘कोई  क्या  करे  उनका ‘?

[10]

‘संसार  की  विधाएँ  नश्वर , मिथ्या  तथा  छण भंगुर  हैं , इसमें  शक  नहीं ‘,
‘यदि हम भूल गए  तो  दुःख,कष्ट,मुसीबतों  से बचना  नितांत  असम्भव  है ‘|

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