Home ज़रा सोचो ‘आपकी सगत’ से किसी के ‘विचार’ शुद्ध होने लगें, [भाग्यशाली] मानिए खुद को |

‘आपकी सगत’ से किसी के ‘विचार’ शुद्ध होने लगें, [भाग्यशाली] मानिए खुद को |

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“अधार्मिक  तथा  दुष्टजनों  की  संगति “, ” अधोगति  में  धकेल  देती  है “,
“सबसे  दया  और  नम्रता  का  बर्ताव””प्रभु  की  उपासना  समझ  कर  कर” |
[2]
जरा सोचो
‘सूरजमुखी’  की  तरह  ‘खिलखिलाते’  रहे  तो  हर  कोई  ‘स्नेह’  परोसेगा,
‘ ढलते ‘  से  ‘ किनारा ‘  और  ‘ उगते ‘  को  ‘ नमन ‘  करती  है  दुनियां !
[3]
जरा सोचो
‘थोड़े  समय’  का  संपर्क  हो  तो  ‘मीठा’  बनना  ही  ‘हितकर’,
उम्र  भर  ‘ साथ ‘  निभाना  है  तो  ‘ स्पष्ट ‘  बनकर  ही  जिएं !
[4]
जरा सोचो
‘किसी  के  पास’  एक  वक्त  की  ‘रोटी’  नहीं, किसी  के  पास  ‘रोटी’ खाने  का  ‘वक्त’  नहीं,
इस  धरा  पर  ‘ शांति  का  स्वरूप ‘  अंतर्ध्यान  है , ‘ईहापोह’  में  भटक  रहे  हैं  हम  सभी !
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 जरा सोचो
अपने  ‘मतलब’  के  लिए  किसी  को  भी  ‘डस’  लेता  है,
तू  तो  ‘ मानव  की  श्रेणी  नहीं ,  सिर्फ  ‘ विषधर ‘  है !
[6]
 जरा सोचो
आप की  ‘संगत’  से  यदि  किसी  के  ‘विचार’  शुद्ध  होने  लगें,
‘भाग्यशाली’  जानिए  खुद  को, आपका  कोई  ‘तोड़’  नहीं  है !
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जरा सोचो
‘खामोश’ रहकर  मंद मंद  ‘मुस्कुराना’ भी  खूबसूरत  ‘जीवन’ का  पहलू  है ,
जो  ‘ इसे ‘  अपनाएगा , ‘ खूबसूरती ‘  से  ‘ जी ‘  जाएगा  यारों  !
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मेरी सोच
समाज  में  मर्यादायें  टूट  चुकी  हैं ! हर  इंसान  स्वार्थी  और  बिकाऊ  है  !
सुकर्म  से  सजाए  रखो  अपने  घर  को  !
[9]
जरा सोचो
‘नफरत  के  बीज’  किसी  को  ‘ उभरने ‘  ही  नहीं  देते,
‘प्रेम  के  बीज’ इंसान  को ‘फलफूलने’ से  रोक  नहीं  पाते !
तुम  किस  ‘सांचे’ में  ‘ढले’  हो, सोच  कर  तुम्ही  बताइए !
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जरा सोचो
‘ आंखों  से  लबों ‘  तक  ‘ खुशी ‘  के  ‘ प्याले ‘  छलकते   रहें  सबके,
‘नफरत’  की  दीवारें  ‘ लॉघते ‘  रहें , ‘ मस्त ‘  होकर  ही  ‘जियें’  सारे !
[11]
जरा सोचो
कुछ ‘अरमान’ जुबान  पर  रहे, कुछ  दिल  की ‘गहराई’  में,
कुछ  ‘ आंसुओं ‘  में  थे ,  कुछ  ‘ आंखों ‘  में  नजर  आए ,
घुट – घुट  कर  ‘ जीते ‘  रहे  सारी  उम्र ,
प्रभु  | अपनी  ‘ मेहरबानी ‘  बख्श  दे  हमको  !
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