Home ज़रा सोचो ‘आज कितने विरोधाभास हैं ,फिर भी जी रहे हैं -‘- एक चिंतन और प्रेरणा |

‘आज कितने विरोधाभास हैं ,फिर भी जी रहे हैं -‘- एक चिंतन और प्रेरणा |

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जरा सोचो
‘ मन ‘बुरा काम’ करने को तुरंत भागता है,
‘नेक काम’ से मुंह छुपाता है,
यह ‘हीन भावन’ और हीनता’ दर्शाता है,                                                                                                                                                                                कभी ‘उभर’ नहीं सकते’ !

[2]

जरा सोचो
‘यदि  दिल  से  ‘सरल’  और  ‘तरल’  बने  रहे,
‘ सभी  के  ‘ दिलों ‘  में  ‘ घर ‘  बना  लोगे ‘ !

[3]

*ज़िंदगी  में  पहले  ऐसा  पंगा  नहीं  देखा।*
*हवा  शुद्ध  है  पर  मास्क  पहनना  अनिवार्य  है*।
*सड़कें  खाली  हैं  पर  लॉन्ग  ड्राइव  पर  जाना  नामुमकिन  है।*
*लोगों  के  हाथ  साफ  हैं  पर  हाथ  मिलाने  पर  पाबंदी  है।*
*दोस्तों  के  पास  साथ  बैठने  के  लिए  वक़्त  है  पर  उनके  दरवाजे  बंद  हैं।*
*गंगा  का  पानी  साफ  हो  गया  है  पर  उसे  पीना  किस्मत  में  नहीं  है!*
*अपने  अंदर  का  कुक  दीवाना  हुआ  पड़ा  है  पर  किसी  को  खाने  पर  बुला  नहीं  सकते।*
*सोमवार  को  भी  ऑफिस  जाने  के  लिए  दिल  मचल  रहा  है  पर  ऑफिस  में  लंबा  वीकेंड  है।*
*जिनके  पास  पैसे  हैं  उनके  पास  खर्च  करने  के  रास्ते  बंद  हैं।*
*जिनके  पास  पैसे  नहीं  हैं  उनके  पास  कमाने  के  रास्ते  बंद  हैं।*
*पास  में  समय  ही  समय  है  लेकिन  अधूरी  ख्वाहिशें  पूरी  नहीं  कर  सकते।*
*दुश्मन  जगह-जगह  है  पर  उसे  देख  नहीं  सकते।*
*कोई  अपना  दुनिया  छोड़कर  चला  जाए  तो  उसे  छोड़ने  जा  भी  नहीं  सकते।*
*है  तो  सब-कुछ  पर  कुछ  कर  नहीं  सकते।
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जरा सोचो
‘ आंखों  से  न  देखें ,  न  कानों  से  सुने ,  तो  दोनों  ‘व्यर्थ’  है,
‘सत्य’ पर ‘विचार विमर्श’ नहीं  करते, तो  व्यर्थभार  रूप  हो ‘ !
[5]
जरा सोचो
‘सफलता’  के  बाद  ‘ढीले’  पड़े  तो, निश्चित  एक  दिन  ‘हार’  जाओगे,
‘लगातार सीखे, अपने काम की धार ‘पैनी’ करें, ‘अस्थिरता’ उचित नहीं’ !
[6]
जरा सोचो
‘ हाथ  की  लकीरों’ में  जिंदगी  की  हर  बात  छुपी  है  या  नहीं,
‘हमारी  ‘खुशी और गम’  के ‘लम्हे’  दिलों  में  जरूर  बसते  हैं’ !
[7]
जरा सोचो
‘ जो  कहना  था, कह  नहीं  पाए, यह  ‘मर्यादा’  की  नीव  थी,
‘जो  न  कहना  था  कह  बैठे, ‘बेहूदगी  की  पराकाष्ठा’ समझ’ !
[8]
जरा सोचो
‘विपरीत’ भावनाओं  की ‘तपिश’ सभी  महसूस  करते  हैं ,
‘घरों  का  वातावरण’  प्रेम  से  संभलता  है, जरा  सोचो’ !
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