Home कविता “अनंत छमताओं का भण्डार छिपा है तुझमें “|

“अनंत छमताओं का भण्डार छिपा है तुझमें “|

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” रे  मानव  ” ! ” अपनी  गल्तियों  से  सबक  नहीं  लेता ” ,

” बता ” , ” तुझसे   बड़ा   दयनीय   प्राणी    कौन    होगा “,

 “जानबूझ  कर” , “समझता  हुआ  भी  गल्ती  करता  है “,

‘धन’ , ‘यश’ , ‘पद’ ,’ प्रतिष्ठा ‘ ,’ दांव  पर   लगा   देता  है’,

“जब ज्ञान-चक्षु  खुलते  हैं “, “बुढ़ापा  घेर  लेता  है   तुझे” ,

 “अनंत  छमताओं  का  प्रचुर  भण्डार   छिपा   है   तुझमें “,

“जो जीवन कि  दशा  व  दिशा’ “नियत करने में सक्षम  है” ,

“फिर  भी  अथाह  दुःख  व  पीड़ा  का  मरुस्थल लगता  है “,  

“अंतरात्मा  कि  ध्वनि  सुन”,”अनुकूल  कार्य  करता चल “,

“ईश-कृपा  को” ‘सहज  व सरल  रूप  में” “प्राप्त  कर लेगा |

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