Home ज़रा सोचो ‘अदब और सलीके’ से जीना ‘फितरत’ होनी चाहिए सबकी | कुछ विचार जिन को ‘जरा सोचो ‘ |

‘अदब और सलीके’ से जीना ‘फितरत’ होनी चाहिए सबकी | कुछ विचार जिन को ‘जरा सोचो ‘ |

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जरा सोचो
‘आर्थिक  कमजोर ‘  जरूर  हूं  पर  ‘ दोस्त  रूपी  संपत्ति ‘  का  भंडार  हूँ  ,
‘सरकार ने ‘दोस्त टैक्स’ ठोक दिया तो भी, ‘प्यार’ से उसे भी ‘झेल ‘ जाऊंगा’ !

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जरा सोचो
‘ मस्तिष्क’ चिंताओं  का घर  है, ‘झुककर प्रणाम, चिंता युक्त करता है,
‘गुरु , प्रभु  या  बुजुर्ग ‘  को  ‘झुककर  प्रणाम’  चिंताओं  को  घटाता  है’ !

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जरा सोचो
‘हम  कहते  रहते  हैं , बेटियों  का  कोई  घर  नहीं  होता,
‘अनाड़ी  हो, यह  कहो  बिना  बेटी  ‘घर’  घर  नहीं  होता,
‘बेटी –  घर  की ‘ शान  बान  आन’  का  असली  सितारा  है,
‘खुशियों की सौगात है, महकता गुलाब है, घर का चिराग है !
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जरा सोचो
‘अपनों   का  काटा’  पानी  नहीं  मांगता, ‘सड़ने’  की  संभावना  है,
‘ गैर  तो  गैर’ ही  हैं  जनाब, ‘उनकी  ‘बेरुखी’  का  क्या  ‘शिकवा’ ?
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जरा सोचो
‘भेजे  में  घुसा  ‘शैतान’  किसी  ‘कब्रिस्तान’  से  कम  नहीं,
‘गीता, कुरान या बाइबल’ नहीं कहती, किसी का ‘बुरा’ करो’ !
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जरा सोचो
‘जानबूझ  कर  ‘गद्दारी, नाइंसाफी , ‘इंसानियत’  नहीं  होती’,
‘ खुदा  के  दरबार’ में  हर फितरत  का ‘वाजिब’ हिसाब होता है’ !
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जरा सोचो
‘हम  सदा  बड़े  ‘अदब’  और  ‘सलीके’  से  जीते  रहे,
‘सब्र’ का लिहाज करते रहना, हमारी ‘कमजोरी’ रही’ !
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जरा सोचो
‘ सच’  कड़वा  होता  है  फिर  भी, ‘बोलते’ गए, सभी ‘नाराज’ हुए,
‘गजब’ तो तब हुआ ‘बुढ़ापे तक’ ‘मीठा झूठ’ बोलना नहीं आया’ !
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जरा सोचो
‘जरूरत’  के  अनुसार  बनाए  ‘रिश्ते’  एक  दिन  ‘चकनाचूर’  हो  जाएंगे,
‘ दिल से जुड़े’ रिश्तो की ‘अहमियत का एहसास’ जगाए रखना जरूरी है’ !
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जरा सोचो
‘ ख्वाहिश’  थी  उन्हें  नजदीक  से  ‘निहारें,’  मौके  भी  ‘मयस्सर’  हुए,
‘ सामने  आते  ही ‘शर्मो-लिहाज’  का  ‘पर्दा’ नजरों  पर  ‘गिरता’  रहा’ !
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